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🦠 पछेती झुलसा 🗓️ दिसंबर–जनवरी 🥔 आलू

आलू का पछेती झुलसा Late Blight of Potato — Identify, Prevent, Treat

कोहरे और बादल के तीन-चार दिन मिल जाएँ तो हरा-भरा आलू का खेत काला पड़ जाता है। इस रोग में इंतज़ार सबसे महँगा फैसला है।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 9 मिनट पढ़ें 📅 सितंबर 2026

रोग दिखने के बाद वाली दवा अक्सर देर हो चुकी होती है

⏱️
3–7 दिन
पूरा खेत लेने में
🌡️
10–20°C
रोग फैलने का तापमान
🛡️
35–40 दिन
बचाव वाला पहला छिड़काव
📖

भूमिका

आलू में पछेती झुलसा (लेट ब्लाइट) ऐसा रोग है जो किसी और फसल के रोगों जैसा बर्ताव नहीं करता। यह धीरे-धीरे नहीं फैलता — ठंड, कोहरे और बादल वाले तीन-चार दिन मिल जाएँ तो हरा-भरा खेत काला पड़ जाता है, और तब तक करने को कुछ बचता नहीं। दिसंबर-जनवरी में उत्तर भारत के आलू बेल्ट में यही सबसे बड़ा खतरा है।

सबसे महँगी गलतफहमी यह है कि "रोग दिखे तब दवा डालेंगे"। पछेती झुलसे में यह सोच लगभग हमेशा देर कर देती है, क्योंकि जब तक धब्बे दिखते हैं तब तक बीजाणु पूरे खेत में फैल चुके होते हैं। इसका असली इलाज रोग आने से पहले वाला छिड़काव है। यह लेख बताता है कि रोग को कैसे पहचानें, कब से बचाव शुरू करें और कौन सी दवा किस अवस्था पर।


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पछेती झुलसा है क्या

यह फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैन्स (Phytophthora infestans) नाम के जीव से होता है। यह असल में साधारण फफूँद नहीं है, इसीलिए हर फफूँदनाशी इस पर काम नहीं करती — दवा का चुनाव यहाँ मायने रखता है।

इसके बीजाणु हवा और पानी की बूँदों के साथ चलते हैं, और अनुकूल मौसम में एक ही रात में हज़ारों नए बीजाणु बन जाते हैं। यही वजह है कि यह रोग दिनों में नहीं, घंटों में फैलता है।

🌡️
रोग को तीन चीज़ें चाहिए — 10 से 20 डिग्री तापमान, 80% से ऊपर नमी, और बादल या कोहरा। उत्तर भारत के मैदानों में यह संयोग दिसंबर-जनवरी में बनता है। जिस दिन लगातार दो-तीन दिन कोहरा या बूँदाबाँदी हो, उसी दिन से खेत रोज़ देखना शुरू कर दीजिए।

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पहचान — स्वस्थ और ग्रस्त फसल में फर्क

पहचान बिंदु✅ स्वस्थ फसल❌ पछेती झुलसा
पत्ती की शुरुआतएक जैसा हरा रंगकिनारों और नोक से शुरू होकर पानी में भीगे जैसे हल्के हरे धब्बे
धब्बे का रंगकोई धब्बा नहींजल्दी ही भूरे से काले, बेढंगे आकार के
पत्ती की निचली सतहसाफनम सुबह में धब्बे के किनारे सफेद रुई जैसी हल्की परत
फैलने की रफ्तार3–7 दिन में पूरा खेत काला और झुलसा हुआ
तनाहरा, मज़बूतभूरे-काले धब्बे, ऊपर से टूटकर गिरना
कंद (आलू)चिकनी सतहछिलके पर दबे भूरे-बैंगनी धब्बे, अंदर लाल-भूरा दानेदार सड़ाव
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अगेती झुलसा से फर्क कैसे करें: अगेती झुलसे (अल्टरनेरिया) के धब्बे गोल होते हैं और उनमें बैलगाड़ी के पहिये जैसे छल्ले दिखते हैं, और वह पुरानी नीचे की पत्तियों पर गरम-सूखे मौसम में आता है। पछेती झुलसे के धब्बे बेढंगे और पानी में भीगे जैसे होते हैं, ठंडे-नम मौसम में आते हैं, और बहुत तेज़ी से फैलते हैं।

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बिना पैसे खर्च किए बचाव

दवा से पहले ये काम कीजिए — इनमें से कोई भी खर्च नहीं माँगता, और मिलकर ये रोग की तीव्रता आधी कर देते हैं।


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दवा और सही मात्रा

पूरा तरीका दो हिस्सों में है — रोग आने से पहले सुरक्षा वाली (संपर्क) दवा, और रोग दिखने पर अंदर जाने वाली (सिस्टेमिक) दवा के साथ संपर्क दवा। अकेली सिस्टेमिक दवा बार-बार डालने से रोग उस दवा का आदी हो जाता है।

दवा (तकनीकी नाम)मात्रा प्रति लीटर पानीकब उपयुक्त
मैंकोजेब 75% WP2–2.5 ग्रामरोग आने से पहले, बचाव का पहला छिड़काव
साइमोक्सानिल 8% + मैंकोजेब 64% WP2.5–3 ग्रामरोग दिखने पर — पहला असरदार छिड़काव
मेटालैक्सिल 8% + मैंकोजेब 64% WP2.5 ग्रामरोग दिखने पर, बदल-बदल कर
मैंडिप्रोपेमिड 23.4% SC1 मिलीतेज़ फैलाव की स्थिति में
डाइमेथोमॉर्फ + मैंकोजेबलेबल के अनुसारदवा बदलने के चक्र में
⚠️
मात्रा हमेशा डिब्बे पर छपे CIB&RC लेबल से मिलाकर तय कीजिए — फॉर्मूलेशन बदलने पर मात्रा भी बदलती है, और राज्यवार सिफारिश अलग हो सकती है। दवा लेने से पहले नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से पुष्टि कर लीजिए, और कटाई से पहले प्रतीक्षा अवधि (वेटिंग पीरियड) ज़रूर देखिए। छिड़काव के समय मास्क, दस्ताने और पूरे कपड़े पहनिए।

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कंद बचाने का तरीका — खुदाई के आसपास

पत्तियाँ बच भी जाएँ तो भी असली नुकसान कंदों में हो सकता है, और वह भंडारण में जाकर खुलता है। खुदाई के आसपास ये तीन काम रोग को गोदाम तक जाने से रोकते हैं।


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ये गलतियाँ कभी न करें


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कब क्या करें

समयज़रूरी काम
बुवाई के समय (अक्टूबर–नवंबर)स्वस्थ बीज कंद, अच्छी मेड़ और जल निकास
25–30 दिनमिट्टी चढ़ाना — मेड़ ऊँची करें
35–40 दिनबचाव वाला पहला छिड़काव — मैंकोजेब 2–2.5 ग्राम/लीटर
कोहरा/बादल शुरू होते हीरोज़ खेत देखना; निचली पत्तियों की जाँच
रोग दिखते हीसिस्टेमिक + संपर्क दवा, और 7–10 दिन बाद दोहराव
खुदाई से 10–15 दिन पहलेहौलम कटिंग, बेल खेत से बाहर
खुदाई परछिलका सेट होने के बाद निकालें, छाँटकर ही भरें

निष्कर्ष

तीन बातें याद रखिए। पहली — पछेती झुलसा 10–20 डिग्री तापमान, कोहरे और ऊँची नमी में आता है, और 3–7 दिन में पूरा खेत ले सकता है। दूसरी — असली इलाज रोग आने से पहले वाला छिड़काव है, बाद वाला नहीं। तीसरी — दवा बदल-बदल कर डालिए, और खुदाई से 10–15 दिन पहले बेल काट दीजिए

इस रोग में देर का मतलब नुकसान नहीं, पूरा खेत होता है — कोहरा दिखे उसी दिन से तैयारी शुरू कीजिए।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1आलू में पछेती झुलसा कब आता है?
यह रोग तब आता है जब तापमान 10 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच हो, नमी 80% से ऊपर हो और कई दिन बादल या कोहरा रहे — उत्तर भारत के मैदानों में यह संयोग आमतौर पर दिसंबर और जनवरी में बनता है। लगातार दो-तीन दिन कोहरा या बूँदाबाँदी हो जाए तो उसी दिन से खेत रोज़ देखना शुरू कर देना चाहिए।
2आलू के पछेती झुलसा की पहचान कैसे करें?
सबसे पहले पत्तियों के किनारों और नोक पर पानी में भीगे जैसे हल्के हरे धब्बे बनते हैं, जो जल्दी ही भूरे-काले और बेढंगे आकार के हो जाते हैं। नम सुबह में इन धब्बों के किनारे पत्ती की निचली सतह पर सफेद रुई जैसी हल्की परत दिखती है, और मौसम अनुकूल रहे तो 3 से 7 दिन में पूरा खेत काला पड़ जाता है।
3पछेती झुलसा की सबसे असरदार दवा कौन सी है?
रोग आने से पहले मैंकोजेब 75% WP @ 2–2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी का बचाव वाला छिड़काव सबसे असरदार कदम है। रोग दिख जाने पर साइमोक्सानिल 8% + मैंकोजेब 64% WP @ 2.5–3 ग्राम प्रति लीटर या मेटालैक्सिल 8% + मैंकोजेब 64% WP @ 2.5 ग्राम प्रति लीटर दिया जाता है। मात्रा डिब्बे के CIB&RC लेबल से मिलाइए और कृषि विज्ञान केंद्र से पुष्टि कर लीजिए।
4पहला छिड़काव कब करना चाहिए?
बुवाई के लगभग 35–40 दिन बाद, या जैसे ही लगातार कोहरा और बादल शुरू हों — रोग दिखने का इंतज़ार किए बिना। पछेती झुलसे में यही सबसे बड़ी बात है: जब तक धब्बे दिखते हैं, बीजाणु पूरे खेत में फैल चुके होते हैं, इसलिए बचाव वाला छिड़काव ही असली इलाज है। मौसम खराब रहे तो हर 7–10 दिन पर दोहराइए।
5अगेती और पछेती झुलसा में क्या फर्क है?
अगेती झुलसे के धब्बे गोल होते हैं और उनमें पहिये जैसे छल्ले दिखते हैं, वह पुरानी नीचे की पत्तियों पर गरम और सूखे मौसम में आता है। पछेती झुलसे के धब्बे बेढंगे और पानी में भीगे जैसे होते हैं, ठंडे-नम मौसम में आते हैं और बहुत तेज़ी से फैलते हैं। दोनों की दवा भी अलग है, इसलिए पहचान ज़रूरी है।
6क्या पछेती झुलसा आलू के कंद भी खराब करता है?
हाँ। पत्तियों से धुलकर आए बीजाणु मिट्टी में उतरकर कंदों तक पहुँचते हैं, जिससे छिलके पर दबे भूरे-बैंगनी धब्बे और अंदर लाल-भूरा दानेदार सड़ाव बनता है। इसी वजह से मेड़ ऊँची रखना और खुदाई से 10–15 दिन पहले बेल काट देना ज़रूरी है, वरना नुकसान भंडारण में जाकर खुलता है।
7बिना दवा के पछेती झुलसे से कैसे बचें?
पूरी तरह बचाव तो नहीं होता, पर तीव्रता आधी की जा सकती है — स्वस्थ बीज कंद, ऊँची मेड़, अच्छा जल निकास, सुबह की सिंचाई और रोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर गाड़ देना। पिछले साल के छोड़े गए आलू और अपने-आप उगे पौधे हटाना भी ज़रूरी है, क्योंकि वही रोग को अगले सीज़न तक ज़िंदा रखते हैं।
8हौलम कटिंग क्या है और कब करनी चाहिए?
हौलम कटिंग का मतलब है खुदाई से 10–15 दिन पहले आलू की पूरी ऊपरी बेल काटकर खेत से बाहर हटा देना। इससे पत्तियों पर बचे बीजाणु कंदों तक नहीं पहुँच पाते और कंद का छिलका भी सख्त हो जाता है, जिससे भंडारण में सड़न बहुत कम होती है।
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