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भूमिका
नासिक, सांगली और आसपास के अंगूर के बाग़ों में अक्टूबर की फल छँटाई (फळ छाटणी) के बाद के तीन-चार हफ़्ते साल के सबसे नाज़ुक हफ़्ते होते हैं। नई कोंपल निकल रही होती है, मानसून अभी पूरी तरह गया नहीं होता, और रात में पत्तियों पर ओस जमी रहती है। यही तीनों बातें मिलकर डाउनी मिल्ड्यू — जिसे स्थानीय भाषा में केवड़ा या डाऊनी कहते हैं — को न्योता देती हैं।
इस रोग के बारे में सबसे ज़रूरी बात यह है कि यह असल में साधारण फफूँद है ही नहीं। इसका कारक Plasmopara viticola एक ऊमाइसीट है, और यही वजह है कि गंधक जैसी वे दवाएँ जो भुरी (पाउडरी मिल्ड्यू) पर चल जाती हैं, इस पर बिल्कुल बेकार जाती हैं। दूसरी बात — अंगूर निर्यात की फसल है, इसलिए यहाँ दवा का चुनाव सिर्फ़ असर का नहीं, अवशेष (residue) का भी सवाल है। एक गलत छिड़काव पूरी खेप को निर्यात से बाहर कर सकता है।
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पहचान — तेलकट डाग और नीचे की सफ़ेद रुई
डाउनी की पहचान का सबसे भरोसेमंद तरीक़ा यह है कि पत्ती को ऊपर से और नीचे से, दोनों तरफ़ से देखिए। ऊपर से जो धब्बा तेल की बूँद जैसा चिकना दिखता है, उसी के ठीक नीचे सफ़ेद रुई जैसी परत मिलेगी — यही डाउनी है।
| देखने की बात | ✅ स्वस्थ बेल | ❌ डाउनी से ग्रस्त |
| पत्ती ऊपर से | एक-सा हरा रंग | तेल की बूँद जैसे पीले-चिकने धब्बे |
| पत्ती नीचे से | साफ़ | धब्बे के ठीक नीचे सफ़ेद रुई जैसी परत |
| कुछ दिन बाद | कोई बदलाव नहीं | धब्बा भूरा-सूखा, पत्ती झड़ने लगती है |
| घड़ (बंच) पर | दाने हरे, एक-से | छोटे दाने भूरे-चमड़े जैसे, घड़ सूखने लगता है |
| नई कोंपल | सीधी बढ़वार | टेढ़ी, मोटी, सफ़ेद परत लिए |
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डाउनी और भुरी (पाउडरी) को मत मिलाइए। भुरी में सफ़ेद पाउडर पत्ती के ऊपर दिखता है और वह सूखे मौसम में बढ़ती है; डाउनी में सफ़ेद परत पत्ती के नीचे होती है और वह नमी में बढ़ती है। दोनों की दवा अलग है — गंधक भुरी पर चलता है, डाउनी पर नहीं।
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यह कब हमला करता है — मौसम की तीन शर्तें
डाउनी अपने आप नहीं फैलता; उसे तीन चीज़ें एक साथ चाहिए। जिस रात ये तीनों मिल जाएँ, समझ लीजिए अगले तीन-चार दिन में धब्बे दिखेंगे।
- पत्ती का गीला रहना: बारिश, ओस या ऊपर से की गई सिंचाई — पत्ती कई घंटे लगातार गीली रहनी चाहिए। यही सबसे ज़रूरी शर्त है।
- ठीक-ठाक गरम तापमान: बहुत ठंडी या बहुत गरम रात में यह नहीं फैलता; अक्टूबर-नवंबर की मध्यम गरम, नम रातें इसके लिए सबसे अनुकूल हैं।
- कोमल हरी पत्ती: छँटाई के बाद निकली नई कोंपल सबसे नाज़ुक होती है। पुरानी सख़्त पत्ती पर हमला बहुत कम होता है।
- इसलिए सबसे ख़तरनाक समय: फल छँटाई के बाद के पहले 30–40 दिन, और उसके बाद हर वह हफ़्ता जिसमें बेमौसम बारिश हो जाए।
- मौसम की चेतावनी को छिड़काव का संकेत मानिए: बारिश के बाद छिड़कने से बेहतर है बारिश की चेतावनी पर, उससे पहले, बचाव वाली दवा दे देना। पूर्वानुमान मौसम पेज पर देखा जा सकता है।
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बिना दवा के रोकथाम — यही सबसे सस्ता बचाव है
अंगूर में दवा का खर्च सबसे बड़ा खर्च है, और अवशेष का जोखिम भी उसी के साथ आता है। इसलिए पहले वे काम कीजिए जो बाग़ को ही डाउनी के लिए मुश्किल बना देते हैं।
- छत्र (कैनोपी) खुला रखिए: घनी बेल के भीतर हवा नहीं चलती और पत्ती सुबह देर तक गीली रहती है। पतली-छँटी बेल में पत्ती जल्दी सूखती है, और सूखी पत्ती पर डाउनी नहीं जमता। यह अकेला काम कई छिड़काव बचा देता है।
- ज़मीन पर गिरी पत्तियाँ हटाइए: रोगग्रस्त पत्तियाँ ही अगले हमले का स्रोत हैं। इन्हें बाग़ से बाहर ले जाइए, बाग़ में ही मत सड़ाइए।
- जल-निकास ठीक कीजिए: बाग़ में पानी खड़ा रहने से हवा में नमी बनी रहती है और रात की ओस और भारी हो जाती है।
- ऊपर से सिंचाई मत कीजिए: इस मौसम में स्प्रिंकलर से पत्ती भिगोना डाउनी को खुला न्योता है। ड्रिप से नीचे पानी दीजिए — ड्रिप पर मिलने वाली सब्सिडी की प्रक्रिया PMKSY ड्रिप सिंचाई सब्सिडी में है।
- नाइट्रोजन में संयम: ज़्यादा नाइट्रोजन पर बेल कोमल और घनी हो जाती है — और डाउनी को कोमल पत्ती ही चाहिए।
- रोज़ बाग़ घूमिए: डाउनी दो-तीन दिन में फैलता है। हफ़्ते में एक चक्कर उसकी रफ़्तार से धीमा है।
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दवा — बचाव वाली और भीतर जाने वाली, दोनों का अलग काम
डाउनी की दवाओं की दो श्रेणियाँ हैं और दोनों का समय अलग है। बचाव वाली (protectant) दवा पत्ती के ऊपर चादर बनाती है और हमले से पहले काम आती है; भीतर जाने वाली (systemic) दवा पौधे के भीतर पहुँचकर पहले से घुस चुके रोग को रोकती है। बचाव वाली दवा को हमले के बाद डालना और भीतर जाने वाली दवा को हर बार डालना — दोनों गलत हैं।
| दवा (तकनीकी नाम) | प्रकार | प्रचलित मात्रा / लीटर पानी | कब |
| मैंकोजेब 75% WP | बचाव | लगभग 2 ग्राम | बारिश या ओस की चेतावनी पर, हमले से पहले |
| कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP | बचाव | लगभग 2.5–3 ग्राम | छँटाई के तुरंत बाद, नियमित बचाव |
| मेटालैक्सिल + मैंकोजेब | भीतर जाने वाली | लगभग 2 ग्राम | धब्बे दिख जाने पर |
| फोसेटिल-एल्युमिनियम 80% WP | भीतर जाने वाली | लगभग 0.2% घोल | तेज़ी से फैल रहा हो तब |
| डाइमिथोमॉर्फ / साइमोक्सानिल-मिश्रण | भीतर जाने वाली | लेबल के अनुसार | समूह बदलने के लिए |
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निर्यात के लिए अंगूर उगा रहे हैं तो ऊपर की सूची अकेली काफ़ी नहीं है। ताज़ा अंगूर के निर्यात में कीटनाशक अवशेष की निगरानी के लिए ICAR-राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केंद्र, पुणे को राष्ट्रीय संदर्भ प्रयोगशाला घोषित किया गया है, और हर सीज़न के लिए स्वीकृत रसायनों की अलग सूची, उनकी मात्रा तथा कटाई से पहले की प्रतीक्षा अवधि (PHI) जारी होती है। उसी सूची से बाहर की एक दवा पूरी खेप को यूरोपीय संघ जैसे बाज़ारों से बाहर कर सकती है। इसलिए दवा तय करने से पहले उस साल की स्वीकृत सूची और अपने कृषि विज्ञान केंद्र या द्राक्ष बागायतदार संघ से पुष्टि ज़रूर कीजिए। यह लेख सामान्य जानकारी है, किसी दवा की सिफारिश नहीं।
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छिड़काव पत्ती के नीचे पहुँचना चाहिए। डाउनी की सफ़ेद परत नीचे बनती है और साँस लेने के छिद्र भी नीचे ही हैं। ऊपर से किया गया छिड़काव दिखने में पूरा लगता है और असर में आधा होता है — नोज़ल का रुख ऊपर की ओर करके, नीचे से भी एक फेरा लगाइए।
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दवा बेअसर क्यों हो जाती है
महाराष्ट्र के कई बाग़ों में किसानों ने शिकायत की है कि जो दवा पहले चलती थी वह अब नहीं चलती। इसकी वजह जादू नहीं, प्रतिरोध है — एक ही समूह की दवा बार-बार डालने पर रोगकारक की वह आबादी बच जाती है जिस पर उसका असर नहीं होता, और अगले साल वही आबादी बाग़ में मुख्य हो जाती है।
- हर छिड़काव में समूह बदलिए: लगातार दो बार एक ही समूह की दवा मत डालिए। डिब्बे पर लिखा तकनीकी नाम देखिए, ब्रांड का नाम नहीं — अलग ब्रांड में अकसर वही रसायन होता है।
- भीतर जाने वाली दवा सीमित बार: ये दवाएँ प्रतिरोध सबसे जल्दी बनाती हैं। इन्हें ज़रूरत पर ही, सीज़न में गिनी-चुनी बार दीजिए और बीच में बचाव वाली दवा रखिए।
- पूरी मात्रा दीजिए: पैसा बचाने के लिए आधी मात्रा डालना प्रतिरोध बनने का सबसे तेज़ रास्ता है — रोग मरता नहीं, सिर्फ़ दवा से परिचित हो जाता है।
- बचाव पर टिकिए: जिस बाग़ में बचाव का कार्यक्रम अच्छा है, वहाँ भीतर जाने वाली दवा की ज़रूरत ही कम पड़ती है — और यही प्रतिरोध से बचने का असली तरीका है।
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कब क्या करें — फल छँटाई के बाद का कार्यक्रम
| समय | अवस्था | ज़रूरी काम |
| सितंबर का आख़िर | छँटाई की तैयारी | गिरी पत्तियाँ हटाइए, जल-निकास ठीक कीजिए, छिड़काव यंत्र जाँचिए |
| अक्टूबर की छँटाई के तुरंत बाद | नई कोंपल | बचाव वाली दवा का पहला छिड़काव; छत्र खुला रखिए |
| छँटाई के 10–15 दिन बाद | पत्तियाँ बनना | रोज़ बाग़ घूमिए; पत्ती नीचे से देखिए; मौसम की चेतावनी पर दोबारा बचाव |
| छँटाई के 20–30 दिन बाद | घड़ निकलना | सबसे नाज़ुक अवस्था — बारिश की चेतावनी पर छिड़काव पहले से |
| नवंबर | फूल और दाना बैठना | धब्बे दिखें तो भीतर जाने वाली दवा, समूह बदलकर |
| दिसंबर | दाना बढ़ना | बेमौसम बारिश पर नज़र; अवशेष का हिसाब रखते हुए ही दवा |
| जनवरी–मार्च | पकाव और कटाई | प्रतीक्षा अवधि (PHI) का सख़्त पालन; कटाई से पहले कोई नई दवा नहीं |
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निष्कर्ष
तीन बातें याद रखिए। पहली — पत्ती नीचे से देखिए; ऊपर का तेल जैसा धब्बा और नीचे की सफ़ेद रुई ही डाउनी की पक्की पहचान है, और गंधक इस पर काम नहीं करता। दूसरी — बचाव वाली दवा बारिश से पहले, भीतर जाने वाली दवा धब्बे के बाद; इस क्रम को उलट देना ही ज़्यादातर बाग़ों में पैसा बर्बाद करता है। तीसरी — निर्यात वाले बाग़ में दवा का चुनाव अवशेष की सूची से होता है, असर से नहीं।
डाउनी को हराने का सबसे सस्ता तरीका दवा नहीं, हवा है — जिस बाग़ में पत्ती जल्दी सूख जाती है, वहाँ यह रोग टिकता ही नहीं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1अंगूर में डाउनी मिल्ड्यू की पहचान कैसे करें?
पत्ती को ऊपर और नीचे दोनों तरफ़ से देखिए — ऊपर तेल की बूँद जैसे पीले-चिकने धब्बे और उसी के ठीक नीचे सफ़ेद रुई जैसी परत ही डाउनी की पक्की पहचान है। कुछ दिन बाद धब्बा भूरा-सूखा हो जाता है और पत्ती झड़ने लगती है, और घड़ पर छोटे दाने भूरे-चमड़े जैसे हो जाते हैं। भुरी (पाउडरी मिल्ड्यू) में सफ़ेद पाउडर पत्ती के ऊपर दिखता है — दोनों की दवा अलग है।
2अंगूर के डाउनी मिल्ड्यू पर कौन सी दवा काम करती है?
बचाव के लिए मैंकोजेब 75% WP लगभग 2 ग्राम प्रति लीटर या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP लगभग 2.5–3 ग्राम प्रति लीटर, और रोग दिख जाने पर भीतर जाने वाली दवाएँ जैसे मेटालैक्सिल + मैंकोजेब लगभग 2 ग्राम प्रति लीटर या फोसेटिल-एल्युमिनियम 0.2% काम करती हैं। निर्यात के लिए उगाए जा रहे बाग़ में सिर्फ़ उस सीज़न की स्वीकृत सूची की दवाएँ ही चलेंगी, इसलिए पहले वह सूची और अपने कृषि विज्ञान केंद्र से पुष्टि कीजिए।
3क्या गंधक (सल्फर) डाउनी मिल्ड्यू पर काम करता है?
नहीं — गंधक डाउनी मिल्ड्यू पर काम नहीं करता। इसका कारक Plasmopara viticola एक ऊमाइसीट है, साधारण फफूँद नहीं, और गंधक जैसी दवाएँ उस पर बेअसर रहती हैं। गंधक भुरी यानी पाउडरी मिल्ड्यू की दवा है, जो सूखे मौसम में पत्ती के ऊपर सफ़ेद पाउडर के रूप में दिखती है। दोनों रोगों को मिला देना अंगूर में सबसे आम और सबसे महँगी गलती है।
4डाउनी मिल्ड्यू अंगूर में कब सबसे ज़्यादा फैलता है?
सबसे ख़तरनाक समय अक्टूबर की फल छँटाई के बाद के पहले 30–40 दिन हैं, और उसके बाद हर वह हफ़्ता जिसमें बेमौसम बारिश हो जाए। इसे तीन चीज़ें एक साथ चाहिए — पत्ती का कई घंटे लगातार गीला रहना, मध्यम गरम नम रातें, और छँटाई के बाद निकली कोमल नई कोंपल। इसीलिए बारिश की चेतावनी मिलते ही, बारिश से पहले बचाव वाली दवा दे देना सबसे असरदार रहता है।
5डाउनी मिल्ड्यू पर छिड़काव के बाद भी असर क्यों नहीं होता?
सबसे आम वजह यह है कि दवा पत्ती के नीचे नहीं पहुँची — डाउनी की सफ़ेद परत पत्ती के नीचे बनती है और साँस लेने के छिद्र भी वहीं हैं, इसलिए सिर्फ़ ऊपर से किया गया छिड़काव आधा असर करता है। दूसरी वजह प्रतिरोध है, जो एक ही समूह की दवा बार-बार डालने या पैसा बचाने के लिए आधी मात्रा डालने से बनता है। तीसरी वजह समय है — बचाव वाली दवा हमले के बाद डालना बेकार है।
6अंगूर में बिना दवा के डाउनी कैसे रोकें?
सबसे असरदार मुफ़्त उपाय छत्र (कैनोपी) को खुला रखना है — पतली-छँटी बेल में हवा चलती है, पत्ती सुबह जल्दी सूख जाती है, और सूखी पत्ती पर डाउनी जमता ही नहीं। इसके साथ ज़मीन पर गिरी रोगग्रस्त पत्तियाँ बाग़ से बाहर ले जाइए, जल-निकास ठीक रखिए, इस मौसम में स्प्रिंकलर से ऊपर की सिंचाई बंद कीजिए और नाइट्रोजन में संयम रखिए, क्योंकि ज़्यादा नाइट्रोजन बेल को कोमल और घना बना देता है।
7निर्यात के लिए अंगूर में दवा का चुनाव कैसे करें?
निर्यात वाले बाग़ में दवा असर से नहीं, अवशेष (residue) की स्वीकृत सूची से चुनी जाती है। ताज़ा अंगूर के निर्यात में कीटनाशक अवशेष की निगरानी के लिए ICAR-राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केंद्र, पुणे को राष्ट्रीय संदर्भ प्रयोगशाला घोषित किया गया है, और हर सीज़न स्वीकृत रसायनों की सूची, मात्रा तथा कटाई से पहले की प्रतीक्षा अवधि जारी होती है। उस सूची से बाहर की एक दवा पूरी खेप को यूरोपीय संघ जैसे बाज़ारों से बाहर कर सकती है।
8डाउनी की दवा हर बार बदलनी क्यों पड़ती है?
क्योंकि एक ही समूह की दवा बार-बार डालने पर प्रतिरोध बन जाता है — रोगकारक की वह आबादी बच जाती है जिस पर उस दवा का असर नहीं होता, और अगले साल वही बाग़ में मुख्य हो जाती है। इसलिए डिब्बे पर लिखा तकनीकी नाम देखकर हर छिड़काव में समूह बदलिए, ब्रांड का नाम देखकर नहीं — अलग ब्रांड में अकसर वही रसायन होता है। भीतर जाने वाली दवाएँ प्रतिरोध सबसे जल्दी बनाती हैं, इसलिए उन्हें सीज़न में गिनी-चुनी बार ही दीजिए।