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🏛️ APMC मंडी 🗓️ पूरे साल 📄 3 ज़रूरी कागज़

मंडी में पैसा न मिले तो क्या करें When the Mandi Payment Does Not Come

पहले "अगली गाड़ी के साथ हिसाब", फिर "सीज़न ख़त्म होने दीजिए", और फिर फोन उठना बंद। पैसा वसूलने की ताक़त कानून में है — पर वह कागज़ के सहारे ही चलती है।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 9 मिनट पढ़ें 📅 सितंबर 2026

कानून है, पर वह कागज़ पर चलता है

📄
3
कागज़ हर खेप पर
🏛️
सचिव को
लिखित शिकायत
🗓️
30 दिन
अपील की समय-सीमा
📖

भूमिका

मंडी में माल बिक जाना आधी कहानी है। पूरी कहानी तब बनती है जब पैसा हाथ में आता है — और यहीं हर साल हज़ारों किसान फँसते हैं। पहले "अगली गाड़ी के साथ हिसाब कर देंगे", फिर "सीज़न ख़त्म होने दीजिए", और फिर एक दिन फोन उठना बंद हो जाता है

इस मामले में सबसे ज़रूरी बात यह है कि पैसा वसूलने की ताक़त कानून में है, पर वह ताक़त सिर्फ़ कागज़ के सहारे चलती है। जिस किसान के पास आवक पर्ची, तुलाई पर्ची और बिक्री की पट्टी है, उसकी शिकायत पर मंडी समिति कार्रवाई कर सकती है; जिसके पास सिर्फ़ ज़ुबानी भरोसा है, उसके पास कोई मामला ही नहीं है। यह लेख वही तीन कागज़, वही प्रक्रिया और वही क्रम बताता है जिससे पैसा फँसने से पहले ही बच जाता है।


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तीन कागज़ जो आपको बचाते हैं

मंडी में माल भेजने वाले हर किसान के पास ये तीनों होने चाहिए। इनमें से एक भी न हो तो बाद में साबित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि आपका माल गया ही था।

कागज़यह क्या साबित करता हैकब लेना है
आवक / गेट पर्चीआपका माल इस तारीख़ को मंडी में आयागाड़ी के मंडी में घुसते समय
तुलाई पर्चीमाल का असली वज़न कितना थातुलाई के तुरंत बाद
बिक्री पट्टीकिस भाव बिका, क्या-क्या कटा, कितना बनता हैबिक्री के दिन ही
💡
पट्टी की फोटो उसी दिन खींच लीजिए और उसे व्हाट्सऐप पर अपने ही नंबर या घर के किसी सदस्य को भेज दीजिए। इससे उस पर तारीख़ का अपने आप एक रिकॉर्ड बन जाता है, और कागज़ खो जाने पर भी सबूत बचा रहता है। यह सबसे सस्ती सुरक्षा है जो कोई किसान ले सकता है।

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पट्टी में क्या-क्या देखना है

पट्टी सिर्फ़ हिसाब का कागज़ नहीं, आपका सबसे मज़बूत सबूत है। अधूरी पट्टी लेना ही ज़्यादातर विवादों की शुरुआत है।

बिंदु✅ पूरी पट्टी❌ अधूरी पट्टी
तारीख़साफ़ लिखी हुईखाली या धुँधली
किसान का नाम व गाँवपूरासिर्फ़ पहला नाम या कुछ नहीं
माल और मात्राफसल, कैरेट/बोरे की गिनती, कुल वज़नसिर्फ़ "माल"
दरप्रति क्विंटल या प्रति कैरेट का भावसिर्फ़ कुल रकम
कटौतियाँहर कटौती अलग-अलग नाम सेएक साथ "खर्चा" लिखकर
देय राशिसाफ़ लिखी हुई"बाद में बताएँगे"
मुहर और हस्ताक्षरदुकान की मुहर और दस्तख़तसिर्फ़ कच्ची पर्ची

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कानून क्या कहता है

महाराष्ट्र कृषि उपज विपणन (विनियमन) अधिनियम, 1963 की धारा 31 में यह प्रावधान है कि बाज़ार समिति राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से वह दर तय करेगी जिस पर आढ़तिया खरीदार से आढ़त (कमीशन) लेगा। यानी कानून की मंशा में आढ़त खरीदार की ज़िम्मेदारी है, किसान की नहीं

सुधारों के बाद यह और साफ़ हो गया — कृषि उपज के लेन-देन में किसान-विक्रेता को देय राशि में से आढ़त की कटौती नहीं की जानी चाहिए। इसी तरह मार्केट फीस चुकाना खरीदार, आढ़तिया, प्रसंस्करणकर्ता या व्यापारी की ज़िम्मेदारी है, जो तुलाई या माप के तुरंत बाद देनी होती है।

⚠️
यह लेख कानूनी सलाह नहीं है। APMC अधिनियम, नियम और हर बाज़ार समिति की उप-विधियाँ राज्य और मंडी के हिसाब से अलग होती हैं और समय-समय पर बदलती हैं — भुगतान की समय-सीमा भी उसी बाज़ार समिति की उप-विधि से तय होती है। अपने मामले में सही स्थिति अपनी बाज़ार समिति के सचिव कार्यालय या ज़िले के कृषि विपणन/सहकारिता कार्यालय से पुष्टि कीजिए। KrashiMitra न कोई एजेंट है, न कोई वसूली करवाता है।

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पैसा न मिले तो क्रम से क्या करें

घबराइए मत और सीधे झगड़ा भी मत कीजिए। हर कदम अगले कदम का सबूत बनाता है, और यही क्रम काम आता है।

क्रमक्या कीजिए
1पहले पट्टी और पर्चियाँ जमा कीजिए — जो कागज़ नहीं है, उसे अभी माँगिए, जब तक रिश्ता ठीक है
2आढ़तिया से भुगतान की तारीख़ लिखित या मैसेज पर लीजिए; ज़ुबानी वादे को व्हाट्सऐप पर दोहरा दीजिए
3तारीख़ निकल जाए तो एक विनम्र लिखित याद-पत्र दीजिए और उसकी पावती लीजिए
4फिर भी न मिले तो बाज़ार समिति के सचिव को लिखित शिकायत दीजिए — पट्टी, पर्चियों और याद-पत्र की कॉपी लगाइए
5शिकायत की पावती और शिकायत क्रमांक ज़रूर लीजिए; यही आपकी फ़ाइल का नंबर है
6समिति सुनवाई बुलाए तो सारे मूल कागज़ लेकर जाइए, कॉपी देकर मूल अपने पास रखिए
7समिति के स्तर पर बात न बने तो कृषि विपणन निदेशक के पास मामला जाता है, और उनके निर्णय से असंतुष्ट पक्ष 30 दिन के भीतर राज्य सरकार को अपील कर सकता है
8रकम बड़ी हो तो साथ-साथ वकील से सलाह लीजिए — APMC की प्रक्रिया अदालत का रास्ता बंद नहीं करती
💡
अकेले नहीं, मिलकर शिकायत कीजिए। जो आढ़तिया एक किसान का पैसा रोकता है वह अकसर कई किसानों का रोके बैठा होता है। एक ही आढ़तिये के ख़िलाफ़ कई किसानों की एक साथ लिखित शिकायत पर बाज़ार समिति कहीं तेज़ी से हरकत में आती है — और यही FPO जैसे संगठन का सबसे सीधा फ़ायदा भी है, जो FPO वाले लेख में समझाया गया है।

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बाज़ार समिति के पास ताक़त क्या है

किसान अकसर सोचता है कि मंडी समिति सिर्फ़ फीस वसूलने की जगह है। असल में मंडी में काम करने वाला हर व्यापारी और आढ़तिया उसी समिति के लाइसेंस पर बैठा है, और वही लाइसेंस उसका सबसे बड़ा दबाव-बिंदु है।


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ये गलतियाँ कभी न करें


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पैसा फँसने से पहले रोकने की आदतें

कबआदत
नए आढ़तिये से पहलेलाइसेंस नंबर पूछिए और बाज़ार समिति से पुष्टि कीजिए
पहली बारछोटी खेप भेजिए और देखिए कि भुगतान कितने दिन में आता है
हर खेप परआवक पर्ची, तुलाई पर्ची और पट्टी — तीनों लीजिए
हर पट्टी परउसी दिन फोटो खींचकर व्हाट्सऐप पर सुरक्षित कीजिए
भुगतानबैंक खाते में लीजिए; नक़द लें तो रसीद ज़रूर
बकाया होते हीनई खेप रोक दीजिए — यही एकमात्र दबाव है जो आपके हाथ में है
हर सीज़नएक छोटी कॉपी में तारीख़, माल, भाव और भुगतान का हिसाब लिखते चलिए
हमेशादो-तीन खरीदारों से रिश्ता बनाए रखिए

निष्कर्ष

तीन बातें याद रखिए। पहली — आवक पर्ची, तुलाई पर्ची और मुहर लगी पट्टी हर खेप पर लीजिए, और उसी दिन फोटो खींच लीजिए; कागज़ के बिना कोई शिकायत आगे नहीं बढ़ती। दूसरी — बकाया होते ही नई खेप रोक दीजिए, क्योंकि माल भेजते रहना ही फँसी रकम को बढ़ाता है। तीसरी — शिकायत लिखित में, बाज़ार समिति के सचिव को, पावती लेकर दीजिए; व्यापारी का लाइसेंस समिति के हाथ में है और यही आपका असली दबाव है।

कानून की मंशा साफ़ है — आढ़त खरीदार से ली जानी है, किसान की देय राशि में से नहीं। पर कानून तभी काम करता है जब उसे चलाने के लिए कागज़ मौजूद हो।

मंडी में सबसे महँगी चीज़ भरोसा नहीं, बिना पट्टी के भेजा गया माल है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1मंडी में माल बेचा पर पैसा नहीं मिला — क्या करें?
सबसे पहले पट्टी और पर्चियाँ इकट्ठी कीजिए, फिर आढ़तिये से भुगतान की तारीख़ लिखित या मैसेज पर लीजिए, और तारीख़ निकलने पर पावती लेकर एक लिखित याद-पत्र दीजिए। इसके बाद भी पैसा न मिले तो बाज़ार समिति के सचिव को लिखित शिकायत दीजिए और उसकी पावती तथा शिकायत क्रमांक ज़रूर लीजिए। समिति के स्तर पर बात न बने तो मामला कृषि विपणन निदेशक तक जाता है, और उनके निर्णय से असंतुष्ट पक्ष 30 दिन के भीतर राज्य सरकार को अपील कर सकता है।
2मंडी में कौन-कौन से कागज़ ज़रूर लेने चाहिए?
तीन कागज़ हर खेप पर लेने चाहिए — आवक (गेट) पर्ची, जो साबित करती है कि आपका माल उस तारीख़ को मंडी में आया; तुलाई पर्ची, जो असली वज़न बताती है; और बिक्री पट्टी, जो भाव, कटौतियाँ और देय राशि दिखाती है। पट्टी पर दुकान की मुहर और हस्ताक्षर होने चाहिए, और उसकी फोटो उसी दिन खींचकर व्हाट्सऐप पर सुरक्षित कर लीजिए — कागज़ खो जाने पर भी सबूत बचा रहता है।
3क्या आढ़त (कमीशन) किसान से कटनी चाहिए?
महाराष्ट्र कृषि उपज विपणन (विनियमन) अधिनियम, 1963 की धारा 31 के अनुसार बाज़ार समिति वह दर तय करती है जिस पर आढ़तिया खरीदार से आढ़त लेगा — यानी कानून की मंशा में आढ़त खरीदार की ज़िम्मेदारी है, किसान की नहीं। सुधारों के बाद यह और साफ़ है कि किसान-विक्रेता को देय राशि में से आढ़त की कटौती नहीं की जानी चाहिए। मार्केट फीस चुकाना भी खरीदार, आढ़तिया या व्यापारी की ज़िम्मेदारी है।
4बिक्री पट्टी में क्या-क्या लिखा होना चाहिए?
पूरी पट्टी में तारीख़, किसान का नाम व गाँव, फसल का नाम, कैरेट या बोरों की गिनती, कुल वज़न, प्रति क्विंटल या प्रति कैरेट की दर, हर कटौती अलग-अलग नाम से, देय राशि, और दुकान की मुहर व हस्ताक्षर — सब होना चाहिए। सारी कटौतियों को एक साथ "खर्चा" लिखवा लेना सबसे बड़ी भूल है, क्योंकि फिर आप जाँच ही नहीं सकते कि क्या सही कटा। सिर्फ़ कुल रकम वाली पट्टी से यह भी पता नहीं चलता कि माल किस भाव बिका।
5पैसा फँसा हो तो क्या अगली खेप भेजनी चाहिए?
नहीं — बकाया चुकने तक नई खेप रोक देना ही एकमात्र दबाव है जो किसान के हाथ में है। पैसा फँसा होने पर भी माल भेजते रहना सबसे आम और सबसे भारी भूल है, क्योंकि इससे फँसी रकम बढ़ती जाती है और आपकी सौदेबाज़ी की ताक़त घटती जाती है। इसीलिए पूरी फसल एक ही आढ़तिये को देने के बजाय दो-तीन खरीदारों से रिश्ता बनाए रखना चाहिए — यह जोखिम बाँटने का सबसे आसान तरीक़ा है।
6बाज़ार समिति आढ़तिये पर क्या कार्रवाई कर सकती है?
मंडी में काम करने वाला हर व्यापारी और आढ़तिया उसी बाज़ार समिति के लाइसेंस पर बैठा है, और लाइसेंस निलंबित होने का मतलब उसकी दुकान बंद होना है — यही उसका सबसे बड़ा दबाव-बिंदु है। लाइसेंस के साथ व्यापारी को समिति के पास सुरक्षा जमा राशि भी रखनी होती है, जिससे विवाद की स्थिति में वसूली का रास्ता बनता है। साथ ही आवक पर्ची और नीलामी का रिकॉर्ड समिति के पास होता है, इसलिए वह ख़ुद जाँच सकती है कि आपका माल आया था।
7नए आढ़तिये को माल भेजने से पहले क्या जाँचें?
उसका लाइसेंस नंबर पूछिए और बाज़ार समिति के दफ़्तर से उसकी पुष्टि कर लीजिए — यह एक फोन कॉल का काम है और बहुत बड़ा नुक़सान बचा देता है। इसके बाद पहली बार छोटी खेप भेजकर देखिए कि भुगतान कितने दिन में आता है। भुगतान बैंक खाते में लीजिए, क्योंकि उससे अपने आप रिकॉर्ड बन जाता है; नक़द लेना ही पड़े तो रसीद ज़रूर लीजिए।
8मंडी में भुगतान कितने दिन में मिलना चाहिए?
भुगतान की समय-सीमा उस बाज़ार समिति की उप-विधियों (bylaws) से तय होती है और राज्य तथा मंडी के हिसाब से अलग-अलग होती है, इसलिए इसे अपनी मंडी के सचिव कार्यालय से पूछकर ही मानिए। व्यवहार में सबसे सुरक्षित तरीक़ा यह है कि माल भेजने से पहले ही भुगतान की तारीख़ तय कर लीजिए और उसे मैसेज पर लिखवा लीजिए — ज़ुबानी वादे को व्हाट्सऐप पर दोहरा देना भी एक तरह का रिकॉर्ड बना देता है।
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