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प्राकृतिक खेती और जीवामृत Natural Farming — Jeevamrit & the Four Pillars

जीवामृत को लोग खाद समझ लेते हैं — यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। इसमें पोषक तत्व लगभग नहीं होते; यह मिट्टी के जीवाणुओं का भोजन है, और अकेले काम नहीं करता।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 11 मिनट पढ़ें 📅 अगस्त 2026

खाद नहीं, जीवाणुओं का भोजन

🚫
अकेले नहीं
आच्छादन ज़रूरी है
🔄
2–3 बार रोज़
ड्रम हिलाना ज़रूरी
🗓️
7–15 दिन
इस्तेमाल की अवधि
📖

भूमिका

खाद और दवा का खर्च हर साल बढ़ता जा रहा है, और उपज उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही — यह शिकायत आज लगभग हर किसान की है। इसी पृष्ठभूमि में प्राकृतिक खेती की चर्चा तेज़ हुई है, जिसे सरकार भी राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के ज़रिए बढ़ावा दे रही है।

इसका मूल विचार सीधा है: बाहर से खरीदी जाने वाली चीज़ें घटाकर, खेत और देसी गाय से मिलने वाली चीज़ों पर खेती चलाना। इसका मुख्य आधार है जीवामृत — गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी से बनने वाला एक घोल, जो खाद नहीं बल्कि मिट्टी के सूक्ष्मजीवों का भोजन है। इस लेख में जीवामृत और घनजीवामृत बनाने की पूरी विधि, बीजामृत, आच्छादन (मल्चिंग), और — सबसे ज़रूरी — इसे अपनाने का व्यावहारिक तरीका, बिना पूरे खेत का जोखिम लिए


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चार स्तंभ — पूरी विधि एक नज़र में

स्तंभक्या हैकाम
बीजामृतगोबर, गोमूत्र, चूना और मिट्टी से बना बीज उपचारबीज को शुरुआती फफूंद व रोग से बचाना
जीवामृतगोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन, मिट्टी और पानी का घोलमिट्टी के सूक्ष्मजीवों को बढ़ाना — यही असली "खाद बनाने वाले" हैं
आच्छादन (मल्चिंग)फसल अवशेष, सूखी पत्तियाँ या जीवित फसल से ज़मीन ढकनानमी बचाना, घास रोकना, मिट्टी का तापमान संतुलित रखना
वाफसामिट्टी में हवा और नमी का संतुलनखेत को दलदल नहीं, बस नम रखना — कम पानी में खेती
💡
सबसे ज़रूरी बात जो अक्सर छूट जाती है: जीवामृत "खाद" नहीं है। इसमें पौधे के लिए पोषक तत्व बहुत कम होते हैं। इसका काम है मिट्टी में पहले से मौजूद पोषक तत्वों को पौधे के लिए उपलब्ध बनाने वाले जीवाणुओं की संख्या बढ़ाना। इसीलिए यह अकेले नहीं, आच्छादन और गोबर की खाद के साथ ही काम करता है — इन तीनों में से एक भी छूटा तो नतीजा नहीं मिलता।

🪣

जीवामृत बनाने की विधि

यह सबसे आम और सबसे प्रचलित अनुपात है, जो 200 लीटर के ड्रम के लिए है (लगभग एक एकड़ के लिए):

सामग्रीमात्राक्यों
देसी गाय का ताज़ा गोबर10 किलोसूक्ष्मजीवों का मुख्य स्रोत
देसी गाय का गोमूत्र10 लीटरसूक्ष्मजीवों के लिए पोषण व उत्तेजक
गुड़1–2 किलोजीवाणुओं का भोजन (ऊर्जा)
बेसन (दलहन का आटा)1–2 किलोप्रोटीन का स्रोत
खेत की मेड़ की मिट्टीएक मुट्ठीस्थानीय जीवाणु मिलाने के लिए
पानी200 लीटर तकमाध्यम

बनाने का तरीका:

  1. ड्रम में पानी लेकर उसमें गोबर और गोमूत्र मिलाएँ।
  2. गुड़ और बेसन अलग से थोड़े पानी में घोलकर मिलाएँ, ताकि गुठली न रहे।
  3. मेड़ की एक मुट्ठी मिट्टी डालें।
  4. ड्रम को छाया में रखें और बोरे या जालीदार कपड़े से ढकें — पूरी तरह हवा-बंद न करें, क्योंकि जीवाणुओं को हवा चाहिए।
  5. दिन में 2–3 बार, घड़ी की दिशा में लकड़ी से हिलाएँ। यह क़दम सबसे ज़रूरी है और सबसे ज़्यादा छोड़ा जाता है।
  6. गर्मी में लगभग 4–5 दिन, सर्दी में 7 दिन तक तैयार होने दें। ऊपर झाग आना अच्छा संकेत है।
⚠️
तैयार जीवामृत को ज़्यादा दिन न रखें — आम तौर पर बनने के 7–15 दिन के भीतर उपयोग कर लेना चाहिए, वरना उसमें मौजूद जीवाणु मरने लगते हैं और वह बदबूदार हो जाता है। छिड़काव या सिंचाई के साथ देते समय कपड़े से छानना ज़रूरी है, वरना पंप का नोज़ल जाम हो जाता है।

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जीवामृत और घनजीवामृत का उपयोग


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ईमानदार बात — क्या उम्मीद रखें और क्या नहीं

प्राकृतिक खेती पर बात करते समय दोनों तरफ से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए जाते हैं। एक व्यावहारिक किसान के लिए संतुलित तस्वीर यह है:

✅ जो सचमुच होता है❌ जो नहीं मान लेना चाहिए
खाद-दवा का नकद खर्च काफी घटता हैकि पहले ही साल उपज बढ़ जाएगी
मिट्टी में जैविक कार्बन, केंचुए और नमी बढ़ते हैंकि मेहनत भी कम हो जाएगी — शुरू में मेहनत बढ़ती है
पानी की ज़रूरत घटती है (आच्छादन से)कि यह हर फसल व हर ज़मीन पर एक जैसा चलेगा
लागत घटने से शुद्ध बचत सुधर सकती हैकि इसका दाम अपने आप ज़्यादा मिलेगा — उसके लिए अलग बाज़ार व प्रमाणन चाहिए
पशु रखने वाले किसान के लिए यह स्वाभाविक रूप से सस्ता पड़ता हैकि बिना पशु के भी यह उतना ही आसान है
⚠️
सबसे व्यावहारिक सलाह: पूरे खेत को एक साथ मत बदलिए। एक-चौथाई या आधे एकड़ से शुरू कीजिए, 2–3 साल तक उसी हिस्से में उपज, लागत और मिट्टी का हाल देखिए, और अपने खेत का अनुभव बनने के बाद ही बढ़ाइए। संक्रमण के शुरुआती सालों में उपज में कुछ गिरावट आ सकती है — इसीलिए पूरी आमदनी इस पर एक साथ मत टिकाइए। योजनाओं और प्रशिक्षण के लिए अपने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या ज़िला कृषि अधिकारी से संपर्क कीजिए।

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ये गलतियाँ कभी न करें


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निष्कर्ष

तीन बातें याद रखिए। पहली — जीवामृत खाद नहीं, जीवाणुओं का भोजन है; यह आच्छादन और गोबर की खाद के साथ ही काम करता है। दूसरी — बनाने की विधि में हिलाना, छाया और ताज़गी तीनों शर्तें हैं, इनमें से एक भी छूटी तो घोल बेअसर है। तीसरी — छोटे हिस्से से शुरू कीजिए और 2–3 साल अपने खेत का अपना अनुभव बनाइए।

प्राकृतिक खेती का असली फायदा उपज में नहीं, लागत में दिखता है — और वह फायदा भी धीरे-धीरे बनता है, रातों-रात नहीं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1जीवामृत कैसे बनाते हैं?
200 लीटर के ड्रम में 10 किलो देसी गाय का ताज़ा गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, 1–2 किलो गुड़, 1–2 किलो बेसन और एक मुट्ठी मेड़ की मिट्टी डालकर पानी से भर दें। ड्रम को छाया में रखें, बोरे से ढकें (सील न करें) और दिन में 2–3 बार घड़ी की दिशा में हिलाएँ। गर्मी में 4–5 दिन और सर्दी में लगभग 7 दिन में तैयार हो जाता है — ऊपर झाग आना अच्छा संकेत है।
2क्या जीवामृत खाद की जगह ले सकता है?
सीधे तौर पर नहीं। जीवामृत में पोषक तत्व बहुत कम होते हैं — यह "खाद" नहीं, मिट्टी के सूक्ष्मजीवों का भोजन है। इसका काम मिट्टी में पहले से मौजूद पोषक तत्वों को पौधे के लिए उपलब्ध बनाने वाले जीवाणु बढ़ाना है। इसीलिए यह आच्छादन (मल्चिंग) और गोबर की खाद के साथ ही काम करता है — तीनों में से एक भी छूटा तो नतीजा नहीं मिलता।
3जीवामृत कितने दिन तक इस्तेमाल किया जा सकता है?
आम तौर पर बनने के 7 से 15 दिन के भीतर। उसके बाद उसमें मौजूद जीवाणु मरने लगते हैं और घोल बदबूदार हो जाता है। अगर लंबे समय तक रखने वाला रूप चाहिए तो घनजीवामृत बनाइए — वही सामग्री गाढ़ा मिश्रण बनाकर छाया में सुखा ली जाती है और महीनों रखी जा सकती है।
4जीवामृत खेत में कैसे देना चाहिए?
सबसे आसान और असरदार तरीका है सिंचाई के पानी की नाली में धीरे-धीरे डालना, ताकि पूरे खेत में बँट जाए — महीने में 1–2 बार। छिड़काव भी किया जा सकता है, पर उससे पहले कपड़े से छानना ज़रूरी है वरना पंप का नोज़ल जाम हो जाता है। शुरुआत आम तौर पर बुवाई या रोपाई के 20–25 दिन बाद से की जाती है।
5घनजीवामृत और जीवामृत में क्या फर्क है?
सामग्री लगभग वही है, फर्क रूप का है। जीवामृत तरल है — सिंचाई या छिड़काव के साथ दिया जाता है और 7–15 दिन में इस्तेमाल करना पड़ता है। घनजीवामृत सूखा रूप है — गाढ़ा मिश्रण छाया में सुखाकर बनाया जाता है, बुवाई के समय खेत में बिखेरा जाता है, और महीनों तक रखा जा सकता है।
6क्या प्राकृतिक खेती से उपज घट जाती है?
संक्रमण के शुरुआती सालों में कुछ गिरावट आ सकती है, क्योंकि मिट्टी को अपनी जैविक व्यवस्था दोबारा बनाने में समय लगता है। इसका असली फायदा उपज में नहीं, लागत में दिखता है — खाद और दवा का नकद खर्च काफी घट जाता है। इसीलिए सबसे व्यावहारिक तरीका है पूरे खेत के बजाय एक-चौथाई या आधे एकड़ से शुरू करना और 2–3 साल अपना अनुभव बनाना।
7बीजामृत क्या है और क्यों किया जाता है?
बीजामृत गोबर, गोमूत्र, चूना और मिट्टी से बना एक बीज उपचार है, जो बुवाई से पहले बीज पर लगाया जाता है। इसका काम बीज और नए अंकुर को शुरुआती फफूंद और मिट्टी-जनित रोगों से बचाना है। यह प्राकृतिक खेती के चार स्तंभों में पहला है।
8प्राकृतिक खेती शुरू करने का सही तरीका क्या है?
पूरा खेत एक साथ मत बदलिए। एक-चौथाई या आधे एकड़ से शुरू कीजिए, वहाँ चारों स्तंभ — बीजामृत, जीवामृत, आच्छादन और वाफसा — पूरे अपनाइए, और 2–3 साल तक उपज, लागत व मिट्टी का हाल देखिए। अनुभव बनने के बाद ही रकबा बढ़ाइए। प्रशिक्षण और चालू योजनाओं की जानकारी के लिए अपने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या ज़िला कृषि अधिकारी से संपर्क कीजिए।
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