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🔥 जलाना दंडनीय 🗓️ अक्टूबर–नवंबर 📍 धान-गेहूं क्षेत्र

पराली प्रबंधन Crop Residue Management — Without Burning

धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच सिर्फ 15–20 दिन होते हैं — इसीलिए आग सबसे आसान रास्ता लगती है। पर एक टन पराली में अगली फसल की 25 किलो पोटाश भी जलती है।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 11 मिनट पढ़ें 📅 अगस्त 2026

फैसला कटाई से पहले लीजिए

🔥
25 किलो K
प्रति टन जलकर खत्म
⏱️
15–20 दिन
कटाई से बुवाई तक
🚜
किराये पर
मशीन खरीदना ज़रूरी नहीं
📖

भूमिका

धान कटने के बाद खेत में बचे ठूँठ और पुआल — जिसे पराली कहते हैं — किसान के लिए हर साल वही मुसीबत लेकर आते हैं। धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच सिर्फ 15–20 दिन होते हैं। इतने कम समय में एकड़ों की पराली हटाना मुश्किल है, और आग लगाना सबसे सस्ता व सबसे तेज़ रास्ता दिखता है।

पर आग लगाने की कीमत सिर्फ जुर्माना नहीं है। एक टन पराली जलाने पर मिट्टी का लगभग 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 25 किलो पोटाश और 1.2 किलो गंधक जलकर खत्म हो जाता है — यानी आप अगली फसल की खाद पहले ही जला रहे हैं। साथ में मिट्टी के वे जीवाणु और केंचुए भी मरते हैं जो ज़मीन को जीवित रखते हैं। इस लेख में पराली के वे रास्ते जो सचमुच काम करते हैं — मशीनें, सब्सिडी, डीकंपोज़र और बेचने का विकल्प।


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जलाने से क्या-क्या जाता है

क्या जलता हैअसर
पोषक तत्वप्रति टन लगभग 5.5 किलो N, 2.3 किलो P, 25 किलो K और 1.2 किलो गंधक — यानी अगली फसल की खाद
मिट्टी के जीवाणु व केंचुएऊपरी परत का तापमान इतना बढ़ जाता है कि लाभदायक सूक्ष्मजीव मर जाते हैं
जैविक कार्बनमिट्टी की जान — यही घटता जाए तो खेत हर साल ज़्यादा खाद माँगता है
नमीऊपरी परत सूख जाती है, गेहूं की बुवाई के लिए ज़्यादा पानी लगता है
कानूनी जोखिमकई राज्यों में पराली जलाना दंडनीय है — जुर्माना, और कुछ जगह राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टि तथा योजनाओं से बाहर होने का प्रावधान
सेहतधुआँ सबसे पहले उसी परिवार और गाँव को लगता है जो खेत के पास है
⚠️
पराली जलाने पर लगने वाला जुर्माना, उसकी दर और कार्रवाई की प्रक्रिया राज्य के अनुसार अलग है और समय-समय पर बदलती रहती है। यह लेख किसी राज्य के मौजूदा नियम की आधिकारिक जानकारी नहीं है — अपने ज़िला कृषि अधिकारी या तहसील कार्यालय से मौजूदा स्थिति और उपलब्ध सहायता की पुष्टि कर लें।

🚜

रास्ता 1 — खेत में ही निपटाना (इन-सीटू)

सबसे व्यावहारिक रास्ता यही है, क्योंकि इसमें पराली ढोनी नहीं पड़ती और पोषक तत्व खेत में ही रह जाते हैं। इसके लिए मशीनें हैं, और ज़्यादातर पर सब्सिडी मिलती है।

मशीनक्या करती हैकिसके लिए
हैप्पी सीडरखड़ी पराली के बीच से ही गेहूं की सीधी बुवाई कर देती है — पराली हटाने की ज़रूरत नहींसबसे लोकप्रिय; समय और पानी दोनों बचते हैं
सुपर सीडरपराली काटकर मिट्टी में मिलाती है और साथ-साथ बुवाई भी करती हैएक ही चक्कर में सब काम; ज़्यादा ताकत वाला ट्रैक्टर चाहिए
सुपर SMS + कंबाइनकंबाइन के पीछे लगकर पुआल को बारीक काटकर खेत में बराबर बिखेर देती हैहैप्पी/सुपर सीडर से बुवाई आसान बनाने के लिए ज़रूरी
मल्चर / श्रेडरठूँठ को बारीक काट देती हैजुताई से पहले पराली गलाना आसान हो जाता है
रोटावेटर / MB प्लाऊपराली को मिट्टी में मिला देती हैसमय ज़्यादा हो तो सबसे सस्ता तरीका
बेलरपराली की गठरी (बेल) बना देती हैबेचने के लिए — नीचे देखिए
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मशीन खरीदना ज़रूरी नहीं। ज़्यादातर राज्यों में ये मशीनें कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC), सहकारी समिति या किसान समूह के पास किराये पर उपलब्ध रहती हैं। छोटे किसान के लिए किराये पर लेना ही समझदारी है — और कई राज्यों में समूह/CHC के लिए सब्सिडी की दर व्यक्तिगत किसान से ज़्यादा होती है। अपने ज़िला कृषि कार्यालय से पता कीजिए कि आपके ब्लॉक में कौन सी मशीन कहाँ उपलब्ध है।

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रास्ता 2 — डीकंपोज़र से पराली गलाना

पूसा डीकंपोज़र (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित) और इसी तरह के दूसरे जैविक उत्पाद ऐसे फफूंद हैं जो पराली को गलाने की गति बढ़ा देते हैं। यह कैप्सूल और तरल दोनों रूप में मिलता है।

⚠️
डीकंपोज़र का घोल बनाने का तरीका, मात्रा और छिड़काव का समय उत्पाद के अनुसार अलग होता है। पैकेट पर दिए निर्देश ध्यान से पढ़िए और अपने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से पुष्टि कर लीजिए — गलत तरीके से बनाया गया घोल बेअसर रहता है। पहली बार में पूरे खेत के बजाय एक हिस्से में आज़माकर देखिए।

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रास्ता 3 — पराली बेचना (एक्स-सीटू)

पिछले कुछ सालों में पराली की माँग सचमुच बनी है। अगर आपके इलाके में खरीदार है, तो यह मुसीबत सीधे आमदनी में बदल जाती है।

खरीदारकिस काम में
बायोमास व CBG (बायो-गैस) प्लांटऊर्जा उत्पादन — सबसे बड़ी और बढ़ती हुई माँग
ईंट भट्ठे व बॉयलरईंधन
कागज़ व पैकेजिंग उद्योगलुगदी
पशुपालक व गौशालाएँचारा और बिछावन (गेहूं का भूसा ज़्यादा; धान की पराली सीमित मात्रा में)
मशरूम उत्पादकढींगरी मशरूम का माध्यम
पैकिंग व नर्सरीपैकिंग सामग्री, मल्चिंग

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ये गलतियाँ कभी न करें


🗓️

कब क्या करें

समयज़रूरी काम
सितंबर (कटाई से पहले)CHC/समिति से मशीन बुक करें; बायोमास प्लांट या खरीदार से बात करें; सब्सिडी के लिए आवेदन
कटाई के समयकंबाइन से नीची कटाई कराएँ और SMS लगवाएँ ताकि पुआल बारीक कटकर बिखर जाए
कटाई के तुरंत बादतय कीजिए — हैप्पी/सुपर सीडर से बुवाई, या डीकंपोज़र, या बेलर से गठरी
डीकंपोज़र चुना होछिड़काव के बाद खेत में नमी बनाए रखें; 20–25 दिन दें
बेलर चुना होगठरी बनते ही उठान कराएँ — खेत में पड़ी गठरी भीगकर खराब होती है
नवंबरगेहूं की समय पर बुवाई — देर होने पर उपज गिरती है

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निष्कर्ष

तीन बातें याद रखिए। पहली — पराली कचरा नहीं, आपकी अगली फसल की खाद है; एक टन जलाने पर 25 किलो पोटाश समेत बहुत कुछ राख हो जाता है। दूसरी — फैसला कटाई से पहले लीजिए, क्योंकि बाद में सिर्फ 15–20 दिन बचते हैं और तब आग ही इकलौता रास्ता लगने लगती है। तीसरी — मशीन खरीदिए मत, किराये पर लीजिए; CHC और किसान समूह इसी के लिए बने हैं।

पराली जलाने में लागत शून्य दिखती है, पर उसका बिल अगली फसल की खाद की पर्ची में आता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1पराली जलाने से खेत को क्या नुकसान होता है?
एक टन पराली जलाने पर लगभग 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 25 किलो पोटाश और 1.2 किलो गंधक जलकर खत्म हो जाता है — यानी अगली फसल की खाद। इसके अलावा मिट्टी की ऊपरी परत के लाभदायक जीवाणु और केंचुए मर जाते हैं, जैविक कार्बन घटता है और नमी उड़ जाती है, जिससे गेहूं की बुवाई में ज़्यादा पानी लगता है।
2हैप्पी सीडर और सुपर सीडर में क्या फर्क है?
हैप्पी सीडर खड़ी पराली के बीच से ही गेहूं की सीधी बुवाई कर देती है — पराली हटाने या मिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, इसलिए समय और पानी दोनों बचते हैं। सुपर सीडर पराली को काटकर मिट्टी में मिलाती है और साथ-साथ बुवाई भी करती है, यानी एक ही चक्कर में सब काम — पर इसे चलाने के लिए ज़्यादा ताकत वाला ट्रैक्टर चाहिए।
3पूसा डीकंपोज़र से पराली कितने दिन में गलती है?
आम तौर पर 20 से 25 दिन। इसलिए यह तभी काम का है जब कटाई और अगली बुवाई के बीच इतना समय हो। सबसे ज़रूरी शर्त नमी है — सूखे खेत में डीकंपोज़र बिल्कुल काम नहीं करता, क्योंकि फफूंद मर जाती है। पराली मल्चर या SMS से बारीक कटी हो तो असर बहुत तेज़ होता है।
4क्या पराली बेची जा सकती है?
हाँ, और पिछले कुछ सालों में इसकी माँग सचमुच बनी है। मुख्य खरीदार हैं बायोमास और CBG (बायो-गैस) प्लांट, ईंट भट्ठे व बॉयलर, कागज़ उद्योग, गौशालाएँ, और मशरूम उत्पादक। इसके लिए बेलर से गठरी बनानी पड़ती है, और सबसे ज़रूरी बात — खरीदार कटाई से पहले तय कीजिए, वरना गठरी खेत में पड़ी रहकर भीग जाती है।
5पराली प्रबंधन की मशीनों पर सब्सिडी मिलती है?
हाँ — फसल अवशेष प्रबंधन की योजनाओं के तहत हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, मल्चर, बेलर जैसी मशीनों पर सहायता का प्रावधान है, और कस्टम हायरिंग सेंटर व किसान समूहों के लिए दर आम तौर पर व्यक्तिगत किसान से ज़्यादा होती है। दरें और प्रक्रिया राज्य के अनुसार अलग हैं और बदलती रहती हैं — अपने ज़िला कृषि अधिकारी से पुष्टि करें, और ध्यान रखें कि ज़्यादातर योजनाओं में काम शुरू करने से पहले स्वीकृति लेनी होती है
6क्या मशीन खरीदना ज़रूरी है?
बिल्कुल नहीं — छोटे और मझोले किसान के लिए किराये पर लेना ही समझदारी है। ये मशीनें ज़्यादातर राज्यों में कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC), सहकारी समिति या किसान समूह के पास उपलब्ध रहती हैं। पहले किराये पर लेकर देखिए कि वह आपके खेत और ट्रैक्टर के साथ ठीक चलती है या नहीं, फिर खरीदने का सोचिए।
7पराली की समस्या कम करने के लिए कटाई के समय क्या करें?
कंबाइन वाले से नीची कटाई कराइए और सुपर SMS लगवाइए। SMS कंबाइन के पीछे लगकर पुआल को बारीक काटकर खेत में बराबर बिखेर देती है, जिससे हैप्पी सीडर या सुपर सीडर से बुवाई आसान हो जाती है और डीकंपोज़र भी तेज़ी से काम करता है। जितना ऊँचा ठूँठ छोड़ा जाएगा, बाद में समस्या उतनी बड़ी होगी।
8क्या पराली जलाने पर जुर्माना लगता है?
कई राज्यों में पराली जलाना दंडनीय है और जुर्माने के साथ-साथ कुछ जगह राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टि तथा कुछ योजनाओं से बाहर होने के प्रावधान भी हैं। जुर्माने की दर, प्रक्रिया और कार्रवाई राज्य के अनुसार अलग है और समय-समय पर बदलती रहती है — अपने ज़िला कृषि अधिकारी या तहसील कार्यालय से मौजूदा स्थिति की पुष्टि कर लें।
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