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भूमिका
खेत में पूरी खाद डालने के बाद भी अगर धान में "खैरा" रोग जैसे जंग-भूरे धब्बे दिख रहे हैं, गेहूं की बढ़वार रुक गई है, या मक्का की पत्तियों पर सफेद-पीली पट्टियाँ आ गई हैं — तो समस्या यूरिया की कमी नहीं, ज़िंक (जस्ता) की कमी हो सकती है।
ज़िंक की ज़रूरत बहुत थोड़ी होती है — इसीलिए इसे सूक्ष्म पोषक तत्व (माइक्रोन्यूट्रिएंट) कहते हैं। पर "थोड़ी ज़रूरत" का मतलब "कम अहमियत" नहीं है। भारत की बड़ी हिस्से की मिट्टियों में ज़िंक की कमी पाई जाती है, और यह वह तत्व है जिसकी कमी सबसे ज़्यादा उपज घटाती है और सबसे कम पहचानी जाती है। अच्छी बात यह है कि इसका इलाज सस्ता है और एक बार डालने पर असर 2–3 साल तक चलता है। इस लेख में पहचान, फसलवार मात्रा, छिड़काव का सही तरीका और वे गलतियाँ जिनसे डाला हुआ ज़िंक भी बेकार चला जाता है।
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पहचान — फसलवार लक्षण
ज़िंक की कमी के लक्षण हमेशा नई, ऊपर की पत्तियों से शुरू होते हैं (क्योंकि ज़िंक पौधे के अंदर पुरानी पत्तियों से नई की ओर नहीं जा पाता) — यही इसे नाइट्रोजन की कमी से अलग करता है।
| फसल | लक्षण | कब दिखता है |
| धान | "खैरा" — पत्तियों पर जंग जैसे भूरे धब्बे, जो नीचे की पत्तियों से फैलकर पूरा खेत भूरा कर देते हैं; पौधा ठिगना, कल्ले कम | रोपाई के 15–25 दिन बाद |
| गेहूं | पत्ती के बीच वाले हिस्से में पीली-सफेद पट्टी, पत्ती बीच से मुड़ जाना, पौधा छोटा | बुवाई के 25–40 दिन बाद |
| मक्का | नई पत्तियों पर सफेद-पीली चौड़ी पट्टियाँ (\"व्हाइट बड\"), पोरियाँ छोटी | शुरुआती 2–4 हफ्ते |
| गन्ना | पत्तियों पर धारियाँ, पौधे की लंबाई रुक जाना | 2–3 महीने की अवस्था |
| नींबू व फलदार पेड़ | छोटी-छोटी पत्तियाँ गुच्छे में (\"लिटिल लीफ\" / रोज़ेटिंग), टहनियाँ सूखना | नई बढ़वार के समय |
| दलहन व सब्ज़ी | नई पत्तियाँ छोटी और पीली, पौधा ठिगना, फूल कम | शुरुआती बढ़वार |
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खेत में तीन-सेकंड की पहचान: पीलापन नीचे की पुरानी पत्तियों से शुरू हो रहा है → नाइट्रोजन की कमी (यूरिया दीजिए)। पीलापन या धब्बे ऊपर की नई पत्तियों से शुरू हो रहे हैं → ज़िंक या गंधक की कमी। और धान में भूरे जंग जैसे धब्बे लगभग हमेशा ज़िंक ही होते हैं।
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किन खेतों में कमी सबसे ज़्यादा होती है
- क्षारीय और ऊसर मिट्टी (pH ज़्यादा): ज़िंक मिट्टी में मौजूद होकर भी पौधे को नहीं मिल पाता।
- धान वाले खेत: लगातार पानी भरा रहने से ज़िंक की उपलब्धता घट जाती है। धान-गेहूं चक्र वाले खेतों में यह सबसे आम समस्या है।
- ज़्यादा फॉस्फोरस डाले गए खेत: बहुत ज़्यादा DAP डालने पर ज़िंक की उपलब्धता घटती है — यह एक बहुत आम और अनजान कारण है।
- बलुई और हल्की मिट्टी: जहाँ जैविक पदार्थ कम है।
- समतलीकरण (लेवलिंग) वाले खेत: जहाँ ऊपर की उपजाऊ मिट्टी हटा दी गई हो।
- लगातार सिर्फ NPK डालने वाले खेत: दशकों से सिर्फ यूरिया-DAP डालने पर सूक्ष्म तत्व चुपचाप खत्म होते जाते हैं।
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इलाज — मिट्टी में और पत्तियों पर
ज़िंक देने के दो रास्ते हैं, और दोनों की जगह अलग है। बाज़ार में मुख्यतः दो रूप मिलते हैं:
| उत्पाद | ज़िंक की मात्रा | टिप्पणी |
| ज़िंक सल्फेट हेप्टाहाइड्रेट | लगभग 21% | सबसे आम और सस्ता; इसी की मात्रा आम तौर पर बताई जाती है |
| ज़िंक सल्फेट मोनोहाइड्रेट | लगभग 33% | ज़्यादा गाढ़ा — इसलिए मात्रा लगभग दो-तिहाई रखी जाती है |
| चिलेटेड ज़िंक (Zn-EDTA) | लगभग 12% | महँगा; छिड़काव में तेज़ असर, क्षारीय मिट्टी में उपयोगी |
1. मिट्टी में (सबसे भरोसेमंद तरीका)
| फसल | ज़िंक सल्फेट (21%) प्रति एकड़ | कब |
| धान | 10 किलो | अंतिम पडलिंग / रोपाई से पहले |
| गेहूं | 10 किलो | बुवाई के समय, आधार खुराक के साथ |
| मक्का | 10 किलो | बुवाई के समय |
| गन्ना | 10–12 किलो | बुवाई के समय नाली में |
| सब्ज़ी व दलहन | 8–10 किलो | क्यारी/बुवाई तैयारी के समय |
2. पत्तियों पर छिड़काव (जब लक्षण खड़ी फसल में दिख जाएँ)
- घोल: 0.5% ज़िंक सल्फेट — यानी लगभग 5 ग्राम प्रति लीटर पानी (100 लीटर पानी में 500 ग्राम)।
- चूने का पानी ज़रूरी: ज़िंक सल्फेट अम्लीय होता है और अकेला छिड़कने पर पत्तियाँ जल सकती हैं। इसलिए इसके साथ आधी मात्रा में बुझा चूना (यानी 500 ग्राम ज़िंक सल्फेट के साथ लगभग 250 ग्राम चूना) का साफ पानी मिलाया जाता है।
- कितनी बार: 10–15 दिन के अंतर पर 2 छिड़काव आम तौर पर पर्याप्त रहते हैं।
- कब: सुबह या शाम, तेज़ धूप में कभी नहीं। छिड़काव के तुरंत बाद बारिश हो जाए तो दोहराना पड़ता है।
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ये मात्राएँ सामान्य संस्तुतियों पर आधारित हैं। सही मात्रा आपकी मिट्टी की जाँच, फसल और क्षेत्र पर निर्भर करती है, और चूने का अनुपात गलत होने पर पत्तियाँ जल सकती हैं। कोई भी छिड़काव करने से पहले अपने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या ज़िला कृषि अधिकारी से पुष्टि कर लें, और पहली बार खेत के एक छोटे हिस्से में आज़माकर देखें। कृषि मित्र कोई रासायनिक सलाह नहीं देता।
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निष्कर्ष
तीन बातें याद रखिए। पहली — ज़िंक की कमी नई पत्तियों से शुरू होती है, और धान का "खैरा" इसकी सबसे पक्की निशानी है। दूसरी — ज़िंक सल्फेट को DAP के साथ मिलाकर कभी मत डालिए, वरना दोनों बेकार हो जाते हैं। तीसरी — यह हर साल डालने वाली चीज़ नहीं है; मिट्टी में एक बार डाला ज़िंक 2–3 साल चलता है।
ज़िंक खेत में सबसे थोड़ी मात्रा में चाहिए होता है, पर उसकी कमी सबसे ज़्यादा उपज ले जाती है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1धान में खैरा रोग क्या है और क्यों होता है?
खैरा असल में कोई रोग नहीं, ज़िंक (जस्ता) की कमी है। इसमें धान की पत्तियों पर जंग जैसे भूरे धब्बे पड़ जाते हैं, पौधा ठिगना रह जाता है और कल्ले कम निकलते हैं। यह आम तौर पर रोपाई के 15–25 दिन बाद दिखता है और लगातार पानी भरे रहने वाले तथा क्षारीय खेतों में सबसे ज़्यादा होता है। इसका इलाज यूरिया नहीं, ज़िंक सल्फेट है।
2ज़िंक की कमी और नाइट्रोजन की कमी में फर्क कैसे पहचानें?
जगह देखिए। नाइट्रोजन की कमी में पीलापन नीचे की पुरानी पत्तियों से शुरू होता है, क्योंकि पौधा उन्हें तोड़कर नई पत्तियों को भेज देता है। ज़िंक की कमी में लक्षण ऊपर की नई पत्तियों से शुरू होते हैं, क्योंकि ज़िंक पौधे के अंदर एक जगह से दूसरी जगह नहीं जा पाता। खेत में यही एक बात देखकर सही खाद चुनी जा सकती है।
3एक एकड़ में कितना ज़िंक सल्फेट डालना चाहिए?
मिट्टी में देने के लिए आम तौर पर 10 किलो ज़िंक सल्फेट (21% वाला) प्रति एकड़ — धान, गेहूं और मक्का में बुवाई/रोपाई के समय। 33% वाला मोनोहाइड्रेट लें तो मात्रा लगभग दो-तिहाई रखी जाती है। सही मात्रा मिट्टी जाँच रिपोर्ट और अपने KVK की संस्तुति से तय करें।
4ज़िंक का छिड़काव कैसे करें?
0.5% घोल — यानी लगभग 5 ग्राम ज़िंक सल्फेट प्रति लीटर पानी (100 लीटर में 500 ग्राम)। इसके साथ आधी मात्रा में बुझा चूना मिलाना ज़रूरी है, वरना पत्तियाँ जल सकती हैं। 10–15 दिन के अंतर पर 2 छिड़काव आम तौर पर पर्याप्त रहते हैं, और छिड़काव सुबह या शाम करें, तेज़ धूप में कभी नहीं।
5क्या ज़िंक सल्फेट को DAP के साथ मिलाकर डाल सकते हैं?
नहीं — यह सबसे आम और सबसे महँगी गलती है। ज़िंक और फॉस्फेट आपस में क्रिया करके ऐसा यौगिक बना लेते हैं जो पौधे को उपलब्ध नहीं होता, यानी दोनों खादों का पैसा बेकार जाता है। दोनों को अलग-अलग, कुछ दिन के अंतर पर डालें।
6ज़िंक कितने साल में एक बार डालना चाहिए?
मिट्टी में डाला गया ज़िंक आम तौर पर 2 से 3 साल तक असर करता है, इसलिए हर साल डालने की ज़रूरत नहीं होती — वह पैसे की बर्बादी है। सही तरीका यह है कि हर 2–3 साल में मिट्टी जाँच कराएँ और रिपोर्ट के आधार पर तय करें।
7किन खेतों में ज़िंक की कमी सबसे ज़्यादा होती है?
क्षारीय और ऊसर मिट्टी, लगातार पानी भरे रहने वाले धान के खेत, बहुत ज़्यादा DAP डाले गए खेत, हल्की बलुई मिट्टी, और समतलीकरण वाले खेत जहाँ ऊपर की उपजाऊ परत हटा दी गई हो। धान-गेहूं चक्र वाले खेतों में यह सबसे आम समस्या है।
8ज़िंक की कमी से बचने का स्थायी उपाय क्या है?
हर साल गोबर की सड़ी खाद डालना सबसे सस्ता और टिकाऊ उपाय है, क्योंकि जैविक पदार्थ ज़िंक की उपलब्धता बढ़ाता है। इसके अलावा धान से पहले हरी खाद (ढैंचा, सनई) पलटना, ज़रूरत से ज़्यादा फॉस्फोरस न डालना, फसल चक्र में दलहन शामिल करना और हर 2–3 साल में मिट्टी जाँच कराना।