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🗓️ बुवाई जून–जुलाई 📍 MP · महाराष्ट्र · कर्नाटक · UP 🐛 उकठा · फली छेदक

अरहर (तुअर) की उन्नत खेती Pigeonpea (Arhar / Tur) Cultivation — Sowing to Harvest

अरहर कम पानी और कम खाद में अच्छा दाम देती है, पर इसकी उपज तीन चीज़ों से गिरती है — खेत में पानी ठहरना, उकठा रोग और फली छेदक। तीनों का इलाज महँगा नहीं है।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 9 मिनट पढ़ें 📅 जुलाई 2026

कम लागत, अच्छा दाम — पर तीन गलतियाँ पूरी फसल ले जाती हैं

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48 घंटे
जलभराव से जड़ें मरने लगती हैं
✂️
30–45 दिन
निपिंग का सही समय
📊
3%
फली नुकसान पर ही छिड़काव
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भूमिका

अरहर (तुअर) उन गिनी-चुनी फसलों में है जो कम पानी, कम खाद और मामूली ज़मीन में भी किसान को अच्छा दाम दिला देती है। दाल की माँग साल भर बनी रहती है, और यह फसल मिट्टी में नाइट्रोजन छोड़कर अगली फसल को भी फायदा पहुँचाती है। फिर भी अरहर की औसत उपज कम रहती है — और इसकी वजह लगभग हमेशा तीन ही होती हैं: खेत में पानी ठहरना, उकठा (विल्ट) रोग, और फली छेदक इल्ली

सबसे बड़ी बात जो शुरू में समझ लेनी चाहिए — अरहर जलभराव बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करती। दो दिन खेत में पानी खड़ा रहे तो पौधे पीले पड़कर मरने लगते हैं। इसीलिए इसकी बुवाई समतल खेत में नहीं, मेड़ या उठी हुई क्यारी पर होनी चाहिए। और दूसरी बात — अरहर की पूरी कमाई फली में है, इसलिए फूल आने के बाद के 40–50 दिन ही असली फसल हैं। इस लेख में किस्म का चुनाव, बुवाई की सही दूरी, बीज उपचार, शीर्ष कटाई (निपिंग), उकठा रोग और फली छेदक का प्रबंधन — आसान हिंदी में।


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किस्म का चुनाव और बुवाई

अरहर की किस्में मुख्य रूप से पकने की अवधि से पहचानी जाती हैं, और यही तय करता है कि आपको कितनी दूरी रखनी है और कितना बीज लगेगा।

अवधिदूरी (कतार × पौधा)बीज दर (लगभग)
जल्दी पकने वाली (लगभग 130–150 दिन)60 × 20 से.मी.20–25 किलो/हेक्टेयर
मध्यम अवधि (लगभग 160–180 दिन)75–90 × 20–25 से.मी.15–18 किलो/हेक्टेयर
देर से पकने वाली (180 दिन से ऊपर)90 × 25–30 से.मी.12–15 किलो/हेक्टेयर
⚠️
अरहर की अनुशंसित किस्में हर राज्य और ज़िले के लिए अलग होती हैं और सूची हर साल संशोधित होती है। बीज खरीदने से पहले अपने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या जिला कृषि कार्यालय से इस साल की अनुशंसित, उकठा-प्रतिरोधी किस्मों की सूची ज़रूर लें और प्रमाणित बीज का बिल रखें।

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जलभराव — अरहर का सबसे बड़ा दुश्मन

अरहर की जड़ें गहरी जाती हैं और उन्हें हवा चाहिए। खेत में 24–48 घंटे से ज़्यादा पानी खड़ा रहते ही जड़ें साँस नहीं ले पातीं — पौधे नीचे से पीले पड़ने लगते हैं और कई बार पूरा हिस्सा सूख जाता है। यह नुकसान किसी रोग से कम नहीं होता, पर इसे दवा से नहीं, फावड़े से रोका जाता है।


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✂️

शीर्ष कटाई (निपिंग) — बिना पैसे के उपज बढ़ाने वाला काम

अरहर की एक खासियत यह है कि फली मुख्य तने पर नहीं, शाखाओं पर लगती है — जितनी ज़्यादा शाखाएँ, उतनी ज़्यादा फलियाँ। इसी बात का फायदा उठाने के लिए शीर्ष कटाई (निपिंग) की जाती है।


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उकठा (विल्ट) रोग — पहचान और बचाव

उकठा अरहर का सबसे बड़ा रोग है। यह मिट्टी में रहने वाली फफूंद से होता है और आमतौर पर फूल आने के आसपास दिखना शुरू होता है — यानी ठीक उस समय जब किसान फसल को लेकर निश्चिंत हो चुका होता है।

पहचान बिंदु✅ स्वस्थ अरहर❌ उकठा ग्रस्त
पौधे की शक्लहरा, तना हुआपत्तियाँ मुरझाकर लटकी, पौधा सूखता हुआ
सूखने का ढंगअक्सर पहले एक तरफ की शाखाएँ (आंशिक उकठा)
तने को चीरने परअंदर सफेद-हराअंदर काली-भूरी धारियाँ
जड़ के पास तनासामान्यकाली धारी ऊपर की ओर चढ़ती हुई
खेत में फैलावधब्बों में, और हर साल उसी खेत में बढ़ता हुआ

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फली छेदक — जहाँ पूरी कमाई तय होती है

फूल आने के बाद अरहर का सबसे बड़ा दुश्मन है फली छेदक इल्ली (Helicoverpa), जो कलियों, फूलों और फलियों में छेद करके दाना खा जाती है। इसके साथ फली मक्खी (podfly) भी लगती है, जिसका नुकसान बाहर से दिखता ही नहीं — फली सामान्य लगती है पर अंदर दाना सिकुड़ा और खाया हुआ मिलता है।

सबसे ज़रूरी नियम — छिड़काव तभी करें जब कीट की संख्या आर्थिक क्षति स्तर (ETL) पार कर जाए। अरहर में यह स्तर आमतौर पर 2 पौधों पर लगभग 1 इल्ली, या 3% फलियों में नुकसान माना जाता है। इससे पहले किया गया छिड़काव पैसा भी खर्च करता है और मित्र-कीट भी मारता है।

दवा (तकनीकी नाम)मात्रा (सामान्य अनुशंसा)कब उपयुक्त
HaNPV (जैविक)लेबल के अनुसार, शाम कोछोटी इल्लियों की अवस्था
नीम तेल 1500 ppmलगभग 3–5 मि.ली./लीटरशुरुआती अवस्था और अंतराल में
क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5% SCलगभग 0.3 मि.ली./लीटरETL पार होने पर, कली-फूल अवस्था
इमामेक्टिन बेंजोएट 5% SGलगभग 0.4 ग्राम/लीटरमध्यम प्रकोप में
फ्लूबेंडियामाइड 39.35% SCलगभग 0.2 मि.ली./लीटरअणु बदलने के लिए
⚠️
ऊपर दी गई मात्राएँ सामान्य अनुशंसा हैं। खरीदने से पहले लेबल पर "अरहर/तुअर" और "फली छेदक" लिखा है या नहीं ज़रूर देखें, और अंतिम मात्रा अपने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या जिला कृषि रक्षा अधिकारी से पुष्टि करके तय करें। हर छिड़काव में अणु बदलें — एक ही दवा दोहराने से प्रतिरोध बनता है। दाल सीधे खाने वाली फसल है, इसलिए कटाई से पहले की प्रतीक्षा अवधि (PHI) का पालन अनिवार्य है।

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ये गलतियाँ कभी न करें


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अरहर का कैलेंडर — कब क्या करें

समयज़रूरी काम
मई – जूनगहरी जुताई, मेड़-नाली बनाना, KVK से उकठा-प्रतिरोधी किस्म की सूची
जून – जुलाई (बुवाई)बीज उपचार (पहले फफूंदनाशी, फिर राइज़ोबियम+PSB); मेड़ पर बुवाई; अवधि के अनुसार दूरी
बुवाई + 30–45 दिनशीर्ष कटाई (निपिंग); निराई-गुड़ाई; नाली की सफाई
अगस्त – सितंबरजलभराव पर नज़र; उकठा ग्रस्त पौधे जड़ समेत हटाएँ
फूल आने की अवस्थाफेरोमोन ट्रैप और बर्ड पर्च लगाएँ; इल्ली की गिनती शुरू करें
फली बनने की अवस्था — सबसे अहमETL पार होने पर ही छिड़काव, अणु बदल-बदलकर; फली मक्खी पर भी नज़र
कटाईजब 75–80% फलियाँ भूरी हो जाएँ — देर करने पर फली चटककर दाना गिरता है

निष्कर्ष

अरहर की उपज बढ़ाने के तीन सबसे सस्ते रास्ते ये हैं: मेड़ पर बुवाई करके जड़ों को पानी से बचाना, 30–45 दिन पर शीर्ष कटाई करके शाखाएँ बढ़ाना, और फली छेदक पर ETL देखकर ही छिड़काव करना। तीनों में कुल खर्च लगभग शून्य है।

अरहर में मेहनत पूरे साल की होती है, पर कमाई फूल आने के बाद के उन 40–50 दिनों में तय होती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1अरहर (तुअर) की बुवाई का सही समय और दूरी क्या है?
खरीफ अरहर की बुवाई मानसून की पहली अच्छी बारिश के साथ, जून–जुलाई में की जाती है। दूरी किस्म की अवधि पर निर्भर करती है — जल्दी पकने वाली किस्म में लगभग 60 × 20 से.मी., मध्यम अवधि में 75–90 × 20–25 से.मी. और देर से पकने वाली में 90 × 25–30 से.मी.। बुवाई हमेशा मेड़ या उठी हुई क्यारी पर करें, क्योंकि अरहर जलभराव बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करती।
2अरहर में शीर्ष कटाई (निपिंग) क्या है और कब करनी चाहिए?
निपिंग यानी बुवाई के लगभग 30–45 दिन बाद मुख्य तने का ऊपरी कोमल सिरा (लगभग 2–4 से.मी.) तोड़ देना। इससे पौधे की ऊपर बढ़ने की ताकत बगल की शाखाओं में चली जाती है, शाखाएँ बढ़ती हैं और फलियों की संख्या बढ़ जाती है। ध्यान रहे — फूल आने के बाद निपिंग नहीं करनी चाहिए
3अरहर में उकठा (विल्ट) रोग की पहचान कैसे करें?
ग्रस्त पौधे की पत्तियाँ मुरझाकर लटक जाती हैं और पौधा सूखने लगता है, अक्सर पहले एक ही तरफ की शाखाएँ (आंशिक उकठा)। पक्की पहचान है — तने को चीरने पर अंदर काली-भूरी धारियाँ दिखना और जड़ के पास से ऊपर चढ़ती काली धारी। यह मिट्टी जनित रोग है और खड़ी फसल में दवा से नहीं रुकता — बचाव प्रतिरोधी किस्म, बीज उपचार और फसल चक्र से होता है।
4अरहर में फली छेदक के लिए छिड़काव कब करें?
छिड़काव तभी करें जब कीट आर्थिक क्षति स्तर (ETL) पार कर जाए — अरहर में यह आमतौर पर 2 पौधों पर लगभग 1 इल्ली, या 3% फलियों में नुकसान माना जाता है। इससे पहले फेरोमोन ट्रैप, बर्ड पर्च, HaNPV और नीम ही काफी हैं। बिना गिने किया गया छिड़काव पैसा खर्च करता है और मित्र-कीट मारकर हालात बिगाड़ता है।
5अरहर में फली छेदक की कौन सी दवा डालें?
आमतौर पर सिफ़ारिश की जाने वाली दवाएँ हैं — क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5% SC (लगभग 0.3 मि.ली./लीटर), इमामेक्टिन बेंजोएट 5% SG (लगभग 0.4 ग्राम/लीटर) और फ्लूबेंडियामाइड 39.35% SC (लगभग 0.2 मि.ली./लीटर); शुरुआती अवस्था में HaNPV और नीम तेल। हर छिड़काव में अणु बदलें, लेबल पर अरहर और फली छेदक लिखा देखें, और मात्रा अपने KVK से पुष्टि करें।
6अरहर में बीज उपचार का सही क्रम क्या है?
क्रम बहुत मायने रखता है — पहले फफूंदनाशी से उपचार करें, उसके बाद राइज़ोबियम और PSB कल्चर लगाएँ। अगर पहले जीवाणु कल्चर लगाकर बाद में फफूंदनाशी मिलाया जाए तो फफूंदनाशी कल्चर के जीवाणुओं को मार देता है और उसका पूरा फायदा खत्म हो जाता है।
7क्या अरहर में यूरिया ज़्यादा डालनी चाहिए?
नहीं — अरहर एक दलहनी फसल है जो जड़ की गाँठों में राइज़ोबियम जीवाणुओं की मदद से खुद नाइट्रोजन बनाती है। ज़्यादा यूरिया देने पर पौधा घना और लंबा तो होता है, पर फलियाँ कम बनती हैं। इसीलिए राइज़ोबियम से बीज उपचार करना यूरिया बढ़ाने से कहीं ज़्यादा फायदेमंद है।
8अरहर की कटाई कब करनी चाहिए?
कटाई तब करें जब 75–80% फलियाँ भूरी होकर पक जाएँ। इससे ज़्यादा देर करने पर फलियाँ चटक जाती हैं और दाना खेत में ही गिर जाता है। कटाई के बाद फसल को अच्छी तरह सुखाकर ही मड़ाई करें, वरना दाने में नमी रह जाती है और भंडारण में घुन तथा फफूंद लग जाती है।
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