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🗓️ बुवाई: अक्टूबर–नवंबर 📍 MP · राजस्थान · UP · महाराष्ट्र 🥀 उकठा-रोधी किस्म ज़रूरी

चने की उन्नत खेती Chickpea (Chana) Cultivation — Varieties, Sowing & Wilt Control

गेहूं को 4–6 पानी चाहिए, चने को अक्सर एक या दो। पर हर साल दो चीज़ें फसल खा जाती हैं — उकठा रोग और फली छेदक इल्ली।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 11 मिनट पढ़ें 📅 अगस्त 2026

कम पानी की फसल — पर सही किस्म और बीज उपचार के बिना नहीं

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75–80 किग्रा
बीज दर / हेक्टेयर
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2 सिंचाई
पूरी फसल में
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उकठा
सबसे बड़ा नुकसान
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भूमिका

चना भारत की सबसे बड़ी दलहनी फसल है — और रबी में यह उस किसान की फसल है जिसके पास सिंचाई का पक्का साधन नहीं है। गेहूं को 4–6 पानी चाहिए, चने को अक्सर एक या दो ही। इसके ऊपर यह खेत में नत्रजन छोड़कर जाता है, जिससे अगली फसल को फायदा होता है।

फिर भी बहुत से किसानों का चना हर साल दो जगह मार खा जाता है — उकठा (विल्ट) रोग, जिसमें पौधा बीच खेत में सूख जाता है, और फली छेदक इल्ली, जो फली में छेद करके दाना खा जाती है। दोनों की जड़ एक ही है: गलत किस्म और बिना बीज उपचार की बुवाई। इस लेख में किस्म का चुनाव, बुवाई का सही समय और बीज दर, बीज उपचार का सही क्रम, उकठा-इल्ली का प्रबंधन और कटाई तक का पूरा कैलेंडर — आसान हिंदी में।


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खेत, समय और बीज दर

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चने की सबसे बड़ी ताकत — कम पानी। यह मुख्यतः मिट्टी में बची नमी (संचित नमी) पर पलता है। इसीलिए खरीफ के बाद खेत की नमी बचाकर रखना (हल्की जुताई और तुरंत पाटा) चने की खेती का पहला काम है, बुवाई नहीं।

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किस्म का चुनाव — उकठा यहीं हारता है

उकठा (विल्ट) रोग की कोई दवा नहीं है — फफूँद मिट्टी में सालों ज़िंदा रहती है। इसलिए बचाव का एकमात्र भरोसेमंद रास्ता उकठा-रोधी किस्म है। कुछ प्रचलित किस्में:

किस्मप्रकारखास बात
JAKI 9218देसीउकठा-रोधी; सिंचित और असिंचित दोनों में उपयुक्त, बहुत लोकप्रिय
JG 14 / JG 16देसीमध्य भारत में व्यापक; अच्छी उपज और सहनशीलता
RVG 202 / RVG 203देसीमध्य प्रदेश-राजस्थान की परिस्थितियों के लिए
विजय / दिग्विजयदेसीमहाराष्ट्र क्षेत्र में प्रचलित
पूसा 372 / पूसा 362देसीउत्तर भारत की पुरानी भरोसेमंद किस्में
GNG 1958 (मरुधर)देसीराजस्थान की परिस्थितियों के लिए
काबुली किस्मेंकाबुलीबड़ा सफेद दाना, ऊँचा भाव, पर बीज दर और देखभाल ज़्यादा
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किस्म हमेशा अपने ज़िले के हिसाब से चुनें। जो किस्म मध्य प्रदेश में शानदार चलती है, वह पंजाब या बुंदेलखंड में उतनी अच्छी न चले। बुवाई से पहले अपने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विभाग से अपने ज़िले के लिए अनुशंसित किस्म की सूची ज़रूर लें, और बीज हमेशा प्रमाणित स्रोत (राज्य बीज निगम, NSC, KVK या पंजीकृत डीलर) से पक्के बिल के साथ खरीदें।

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बीज उपचार — 10 रुपये का काम, हज़ारों की बचत

चने में बीज उपचार वैकल्पिक नहीं, अनिवार्य है — और उसका क्रम भी उतना ही ज़रूरी है। गलत क्रम में करने पर राइज़ोबियम मर जाता है और सारा फायदा खत्म हो जाता है।

  1. पहले फफूँदनाशक: जैसे ट्राइकोडर्मा विरिडी लगभग 5–10 ग्राम प्रति किग्रा बीज (जैविक), या कार्बेन्डाजिम/थीरम आधारित फफूँदनाशक लेबल की दर पर। यह उकठा और जड़ सड़न से पहली सुरक्षा है।
  2. फिर कीटनाशक (ज़रूरत हो तो): दीमक की समस्या वाले खेतों में, पंजीकृत बीज-उपचार कीटनाशक लेबल की दर पर।
  3. सबसे आखिर में जैव-उर्वरक: राइज़ोबियम + PSB, लगभग 5–10 ग्राम प्रति किग्रा बीज। इन्हें हमेशा आखिर में और छाया में मिलाएँ।

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खाद और पानी — यहाँ "कम" ही सही है

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निपिंग (शिखर तोड़ना): बुवाई के लगभग 30–40 दिन बाद पौधे की ऊपरी कोमल कली तोड़ने से शाखाएँ ज़्यादा बनती हैं और फलियाँ बढ़ती हैं। यह पारंपरिक तरीका है और आज भी काम करता है — पर सिर्फ तब, जब फसल अच्छी बढ़वार में हो; कमजोर फसल में इसे न करें।

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उकठा (विल्ट) रोग — पहचान और बचाव

उकठा Fusarium oxysporum f. sp. ciceri नाम की मिट्टी-जनित फफूँद से होता है। पौधा अचानक मुरझाकर सूख जाता है, पर पत्तियाँ पौधे से चिपकी रहती हैं — यही पहचान है।


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फली छेदक इल्ली — कब और कैसे रोकें

चने की फली छेदक (Helicoverpa armigera) ही इस फसल का सबसे बड़ा कीट है। इल्ली फली में छेद करके अंदर सिर डालकर दाना खाती है — बाहर से फली सही दिखती है।

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कोई भी दवा खरीदने से पहले लेबल पर "चना" और "फली छेदक" लिखा है या नहीं ज़रूर देखें (CIB&RC पंजीकरण), और अंतिम मात्रा अपने KVK या कृषि विभाग से पुष्टि करें — राज्य के अनुसार सिफारिश बदलती है। चना दाल के रूप में सीधे खाया जाता है, इसलिए कटाई से पहले की प्रतीक्षा अवधि (PHI) का पालन अनिवार्य है। एक ही दवा बार-बार दोहराने से इस कीट में प्रतिरोध बहुत तेज़ी से बनता है — अणु बदलें, सिर्फ ब्रांड नहीं।

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ये गलतियाँ कभी न करें


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बुवाई से कटाई तक — कब क्या करें

समयज़रूरी काम
सितंबर–अक्टूबरखेत तैयार करें, नमी बचाएँ; ज़िले के लिए अनुशंसित किस्म का प्रमाणित बीज लें
बुवाई के दिनबीज उपचार — फफूँदनाशक → कीटनाशक → राइज़ोबियम+PSB; 5–8 से.मी. गहराई
अक्टूबर–नवंबरबुवाई का सही समय; DAP/SSP कतार में, यूरिया बहुत कम
30–40 दिननिराई-गुड़ाई; अच्छी बढ़वार हो तो निपिंग; बर्ड पर्च और फेरोमोन ट्रैप लगाएँ
40–45 दिनपहली हल्की सिंचाई — फूल आने से पहले
फूल-फली की अवस्थाइल्ली की निगरानी; ज़रूरत पर HaNPV/नीम या पंजीकृत दवा, शाम को
फली भरते समयदूसरी हल्की सिंचाई — उपज पर सबसे बड़ा असर
कटाईपत्तियाँ पीली पड़कर झड़ने लगें और फली सूख जाए; सुबह की नमी में कटाई से दाना कम झड़ता है

निष्कर्ष

चना उस किसान की फसल है जो कम पानी में भरोसेमंद कमाई चाहता है। तीन बातें याद रखिए: ज़िले के लिए अनुशंसित उकठा-रोधी किस्म चुनें, बीज उपचार सही क्रम में करें — फफूँदनाशक, फिर कीटनाशक, सबसे आखिर में राइज़ोबियम, और यूरिया कम, फॉस्फोरस पूरा

चने में उपज खेत में नहीं, बीज की बोरी खोलने से पहले ही तय हो जाती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1चने की बुवाई का सही समय और बीज दर क्या है?
समय पर बुवाई के लिए अक्टूबर से नवंबर सबसे उपयुक्त है, और पछेती किस्मों के लिए दिसंबर की शुरुआत तक। देसी मध्यम दाने वाली किस्मों में बीज दर लगभग 75–80 किग्रा प्रति हेक्टेयर (करीब 30–32 किग्रा प्रति एकड़) रखें। काबुली और मोटे दाने वाली किस्मों में यह बढ़ानी पड़ती है, और पछेती बुवाई में लगभग 20–25% ज़्यादा बीज डालें।
2चने में उकठा (विल्ट) रोग से कैसे बचें?
उकठा की कोई दवा नहीं है — बचाव का एकमात्र भरोसेमंद रास्ता उकठा-रोधी किस्म है, जैसे JAKI 9218, JG 14 या अपने ज़िले के लिए अनुशंसित किस्म। साथ में ट्राइकोडर्मा विरिडी 5–10 ग्राम प्रति किग्रा बीज से बीज उपचार, फसल चक्र, गर्मी की गहरी जुताई और अच्छा जल निकास ज़रूरी है। पहचान — पौधा सूख जाता है पर पत्तियाँ चिपकी रहती हैं, और जड़ चीरने पर अंदर काली धारियाँ दिखती हैं।
3चने में बीज उपचार का सही क्रम क्या है?
क्रम है — पहले फफूँदनाशक, फिर कीटनाशक (ज़रूरत हो तो), और सबसे आखिर में राइज़ोबियम + PSB (लगभग 5–10 ग्राम प्रति किग्रा बीज)। हर चरण के बाद बीज को छाया में सुखाएँ। राइज़ोबियम को कभी फफूँदनाशक से पहले या साथ न मिलाएँ — जीवाणु मर जाते हैं और सारा फायदा खत्म हो जाता है। उपचारित बीज उसी दिन बो देना चाहिए और तेज़ धूप से बचाना चाहिए।
4चने में कितनी सिंचाई करनी चाहिए?
आमतौर पर दो हल्की सिंचाई काफी हैं — पहली बुवाई के 40–45 दिन बाद (फूल आने से पहले) और दूसरी फली भरते समय। दूसरी सिंचाई का उपज पर सबसे ज़्यादा असर होता है। ठीक फूल आने के समय सिंचाई न करें — फूल झड़ जाते हैं। खेत में पानी भरना चने के लिए सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह उकठा रोग को सीधे बढ़ाता है।
5चने में यूरिया कितना डालना चाहिए?
बहुत कम — क्योंकि चना राइज़ोबियम की मदद से अपनी नत्रजन खुद बनाता है। ज़्यादा यूरिया देने पर पौधा सिर्फ पत्ती और डंठल बढ़ाता है, फलियाँ नहीं बनातीं — यह चने की सबसे आम और सबसे महँगी गलती है। इसके बजाय फॉस्फोरस (DAP या SSP) बुवाई के समय कतार में दें, और सल्फर-ज़िंक की मात्रा मिट्टी जाँच रिपोर्ट के आधार पर तय करें।
6चने की फली छेदक इल्ली की दवा कौन सी है?
पहले मुफ्त उपाय आज़माएँ — प्रति एकड़ 8–10 बर्ड पर्च और 2–3 फेरोमोन ट्रैप। जैविक विकल्प में HaNPV लगभग 250 LE प्रति हेक्टेयर और Bt आधारित उत्पाद शाम के समय छिड़कें। कार्रवाई का स्तर आमतौर पर प्रति पौधा 1 इल्ली है। ज़रूरत पड़ने पर क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5% SC, इमामेक्टिन बेंजोएट 5% SG या स्पिनोसैड 45% SC — लेबल की दर पर और प्रतीक्षा अवधि का पालन करते हुए।
7चने में निपिंग क्या है और कब करें?
निपिंग यानी बुवाई के लगभग 30–40 दिन बाद पौधे की ऊपरी कोमल कली तोड़ना। इससे पौधे में शाखाएँ ज़्यादा बनती हैं और फलियों की संख्या बढ़ती है। यह पुराना तरीका है और आज भी काम करता है, पर इसे सिर्फ तब करें जब फसल अच्छी बढ़वार में हो — कमजोर या पछेती फसल में निपिंग करने से उल्टा नुकसान होता है।
8चने की खेती के लिए कौन सी किस्म सबसे अच्छी है?
JAKI 9218 सबसे लोकप्रिय उकठा-रोधी देसी किस्म है, जो सिंचित और असिंचित दोनों परिस्थितियों में चलती है। इसके अलावा JG 14, RVG 202, विजय, दिग्विजय, पूसा 372 और GNG 1958 (मरुधर) अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं। किस्म हमेशा अपने ज़िले के लिए अनुशंसित सूची से ही चुनें — KVK या कृषि विभाग से पूछें, और बीज प्रमाणित स्रोत से पक्के बिल के साथ खरीदें।
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