चना — कम पानी की फसल, पर फ़ैसले बुवाई से पहले होते हैं
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75–80 किलो
बीज दर प्रति हेक्टेयर (देसी)
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2 सिंचाई
45 व 75 दिन पर
📉
30–40%
देर से बुवाई पर नुकसान
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भूमिका
रबी की सबसे भरोसेमंद दलहन चना है — कम पानी में, कम खाद में और अक्सर बिना सिंचाई वाली ज़मीन पर भी यह फसल खड़ी हो जाती है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में यह करोड़ों किसानों की दूसरी कमाई है। फिर भी औसत पैदावार 12–15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पर अटकी रहती है, जबकि सही किस्म, सही समय और सही बीज-उपचार से यही खेत 20–25 क्विंटल तक दे सकता है।
सबसे महंगी गलतफ़हमी यह है कि "चना तो अपने आप हो जाता है"। असल में चने की पैदावार तीन जगह टूटती है — देर से बुवाई, उकठा (विल्ट) रोग और फली छेदक कीट। तीनों का इलाज बुवाई से पहले ही तय हो जाता है, फसल खड़ी होने के बाद नहीं। यह लेख वही तीन फ़ैसले क्रम से बताता है।
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बुवाई का सही समय — यही सबसे बड़ा फ़ैसला है
चने की बुवाई का सही समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर है। असिंचित (बारानी) खेत में अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में, जब मिट्टी में खरीफ की नमी बची हो; और सिंचित खेत में नवंबर के पहले पखवाड़े तक।
नवंबर के बाद बोया गया चना दो तरफ़ से मार खाता है — पौधे की बढ़वार कम रहती है, और फूल आने का समय फरवरी की गर्मी से टकरा जाता है, जिससे फलियाँ भरने से पहले ही फसल पक जाती है। दिसंबर में बोया चना आमतौर पर 30–40% तक कम पैदावार देता है।
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धान काटने के बाद देर हो रही हो तो किस्म बदल दें — देर से बुवाई के लिए अलग किस्में आती हैं (जैसे उत्तर भारत में पूसा 372 जैसी जल्दी पकने वाली किस्में)। देर से बुवाई में बीज दर 15–20% बढ़ा दें, ताकि पौधों की संख्या पूरी रहे।
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देसी चना या काबुली — कौन सा बोएं?
| बात | देसी चना | काबुली चना |
| दाने का रंग-आकार | छोटा, भूरा-पीला | बड़ा, सफ़ेद-क्रीम |
| बीज दर | 75–80 किलो/हेक्टेयर | 100–125 किलो/हेक्टेयर |
| रोग सहनशीलता | ज़्यादा — उकठा कम लगता है | कम — बेहतर ज़मीन चाहिए |
| बाज़ार भाव | सामान्य | आमतौर पर ऊंचा |
| किसके लिए | बारानी व साधारण ज़मीन | सिंचित, अच्छी दोमट ज़मीन |
नए किसान के लिए सीधा नियम: अगर सिंचाई पक्की नहीं है, तो देसी चना ही बोएं। काबुली का भाव भले ऊंचा मिलता हो, पर उसे बेहतर ज़मीन, ज़्यादा सावधानी और ज़्यादा बीज चाहिए — कमज़ोर खेत में उसका ऊंचा भाव कम पैदावार में डूब जाता है।
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बीज उपचार — सबसे सस्ता बीमा
चने में उकठा (विल्ट) सबसे बड़ा दुश्मन है। यह मिट्टी में रहने वाला फफूंद है, और खड़ी फसल में इसका कोई असरदार इलाज नहीं है — पौधा मुरझाकर सूख जाता है, जड़ काली पड़ जाती है। इसलिए इसका पूरा मुकाबला बुवाई से पहले, बीज पर ही होता है।
बीज उपचार का सही क्रम याद रखें — पहले फफूंदनाशक, फिर जैविक, सबसे आख़िर में राइजोबियम:
- फफूंदनाशक: ट्राइकोडर्मा विरिडी 5–10 ग्राम प्रति किलो बीज (जैविक रास्ता), या कार्बेन्डाजिम+थायरम जैसा अनुशंसित फफूंदनाशक।
- छाया में सुखाएं: उपचारित बीज को धूप में नहीं, छाया में सुखाएं।
- राइजोबियम + PSB कल्चर: 5–10 ग्राम प्रति किलो बीज। यही जीवाणु जड़ में गांठें बनाकर हवा से नाइट्रोजन खींचते हैं — इसी वजह से चने को यूरिया की ज़रूरत नहीं पड़ती।
- बुवाई उसी दिन: कल्चर लगाने के बाद बीज को रखा नहीं जाता, उसी दिन बो दें।
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राइजोबियम और PSB कल्चर का एक पैकेट अक्सर बहुत कम कीमत में कृषि विभाग या KVK से मिल जाता है, और यह खाद के खर्च में सीधी बचत कराता है। बुवाई से एक हफ़्ता पहले जाकर पूछ लें — बुवाई के दिन खोजने पर नहीं मिलता।
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बुवाई की दूरी, गहराई और बीज दर
- कतार से कतार: 30 सेंटीमीटर। देर से बुवाई में 25 सेंटीमीटर रखें।
- पौधे से पौधा: 10 सेंटीमीटर।
- गहराई: 5–7 सेंटीमीटर। चना गहरी बुवाई सहन करता है — बल्कि नमी के लिए थोड़ा गहरा बोना बेहतर रहता है, यह इसकी बड़ी ख़ूबी है।
- बीज दर: देसी छोटे दाने वाली किस्म 75–80 किलो/हेक्टेयर, बड़े दाने व काबुली 100–125 किलो/हेक्टेयर।
- पौध संख्या: लक्ष्य लगभग 30–33 पौधे प्रति वर्ग मीटर रखें।
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चना उस ज़मीन पर सबसे अच्छा चलता है जहाँ पानी न रुके। भारी, चिकनी और जलभराव वाली ज़मीन में इसकी जड़ सड़ जाती है। खेत में हल्का ढाल और निकासी की नाली — यह बिना पैसे का सबसे बड़ा उपाय है।
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खाद — चने को यूरिया की ज़रूरत नहीं
चना दलहनी फसल है, यह अपनी नाइट्रोजन खुद बनाती है। इसे यूरिया डालना पैसे की बर्बादी तो है ही, इससे जड़ की गांठें (नाइट्रोजन बनाने वाली फैक्ट्री) बनना भी घट जाता है। ज़रूरत सिर्फ़ शुरुआती "स्टार्टर डोज़" और फॉस्फोरस की है।
| तत्व | मात्रा (प्रति हेक्टेयर) | कब और कैसे |
| नाइट्रोजन (N) | 15–20 किलो | सिर्फ़ स्टार्टर डोज़, बुवाई के समय |
| फॉस्फोरस (P₂O₅) | 40–60 किलो | पूरी मात्रा बुवाई के समय, कूंड़ में |
| पोटाश (K₂O) | 20 किलो | मिट्टी जांच में कमी हो तभी |
| सल्फर (S) | 20 किलो | दाने की गुणवत्ता के लिए, बुवाई पर |
व्यवहार में यह मात्रा लगभग 100 किलो DAP प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय कूंड़ में देकर पूरी हो जाती है। खाद हमेशा बीज के नीचे या बगल में डालें, बीज से सटाकर नहीं।
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ऊपर दी गई मात्राएँ सामान्य सिफ़ारिश हैं। असली मात्रा आपकी मिट्टी जांच रिपोर्ट से तय होनी चाहिए, और राज्यवार सिफ़ारिशें अलग होती हैं — अंतिम फ़ैसले से पहले अपने KVK या ज़िला कृषि कार्यालय से पुष्टि कर लें।
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खुटाई और सिंचाई — दो छोटे काम, बड़ा फ़र्क
खुटाई (निपिंग): बुवाई के 30–40 दिन बाद पौधों की ऊपरी नरम कोंपल तोड़ दी जाती है। इससे पौधा ऊपर बढ़ने के बजाय बगल में शाखाएँ निकालता है, और ज़्यादा शाखा का मतलब ज़्यादा फलियाँ। यह काम बिना किसी लागत के होता है। ध्यान रहे — देर से बोई गई फसल में खुटाई न करें।
सिंचाई: चने को बहुत पानी नहीं चाहिए। सिंचित फसल में दो पानी काफ़ी हैं:
- पहला पानी: बुवाई के 40–45 दिन बाद, जब शाखाएँ निकल रही हों।
- दूसरा पानी: बुवाई के 70–75 दिन बाद, जब फलियाँ भर रही हों।
- फूल आने पर पानी न दें: फूल आने के ठीक समय भारी सिंचाई करने से फूल झड़ जाते हैं और वानस्पतिक बढ़वार बढ़ जाती है।
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चने में ज़्यादा पानी, कम पानी से ज़्यादा नुकसान करता है। खेत में पानी भर देने से जड़ सड़न और उकठा दोनों बढ़ते हैं। हल्की, नपी-तुली सिंचाई ही सही है।
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फली छेदक — चने का सबसे महंगा कीट
चना फली छेदक (हेलिकोवर्पा) की सूंडी फली में छेद करके अंदर का दाना खा जाती है। बाहर से फली सही दिखती है, अंदर खाली निकलती है। बेकाबू होने पर यह अकेला कीट आधी फसल ले जाता है।
बिना पैसे खर्च किए रोकथाम — यही पहले करें:
- पक्षी बैठकें (बर्ड पर्च): खेत में 20–25 प्रति हेक्टेयर लकड़ी की T-आकार खूँटियाँ गाड़ दें। पक्षी बैठकर सूंडियाँ चुन लेते हैं — यह सबसे सस्ता और सबसे कम इस्तेमाल होने वाला उपाय है।
- फेरोमोन ट्रैप: 5 प्रति हेक्टेयर। ये कीट को मारते नहीं, बल्कि बताते हैं कि हमला कब शुरू हुआ — छिड़काव का सही दिन तय करने के लिए।
- गहरी जुताई: गर्मी में गहरी जुताई करने से मिट्टी में छिपे प्यूपा धूप और पक्षियों के हवाले हो जाते हैं।
- सहफसली: चने के साथ धनिया या सरसों की कुछ कतारें बोने से मित्र कीट आकर्षित होते हैं।
जैविक उपाय: हमला शुरू होते ही NPV (हेलिकोवर्पा NPV) 250 LE प्रति हेक्टेयर शाम के समय, या नीम आधारित कीटनाशक (एज़ाडिरेक्टिन) का छिड़काव करें। छोटी सूंडी पर यह बहुत असरदार है; बड़ी सूंडी पर नहीं।
| दवा (तकनीकी नाम) | मात्रा / 10 लीटर पानी | कब उपयुक्त |
| क्विनालफॉस 25 EC | 20 मि.ली. | शुरुआती हमला |
| इमामेक्टिन बेंज़ोएट 5 SG | 4 ग्राम | मध्यम से तेज़ हमला |
| क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5 SC | 3 मि.ली. | तेज़ हमला, लंबा असर |
| स्पिनोसैड 45 SC | 3 मि.ली. | मित्र कीटों पर कम असर |
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हर दवा का इस्तेमाल CIB&RC अनुमोदित लेबल पर लिखी मात्रा के अनुसार ही करें, और अपने KVK या कृषि विभाग से पुष्टि कर लें — राज्यवार सिफ़ारिशें अलग होती हैं। एक ही दवा बार-बार न दोहराएँ, वरना कीट में प्रतिरोध पैदा हो जाता है। छिड़काव हमेशा शाम को करें।
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ये गलतियाँ कभी न करें
- दिसंबर में बुवाई — सबसे आम और सबसे महंगी गलती। समय निकल रहा हो तो जल्दी पकने वाली किस्म लें, पर बुवाई टालें नहीं।
- चने में यूरिया डालना — पैसा भी गया और जड़ की नाइट्रोजन गांठें भी कम बनीं।
- बीज उपचार छोड़ देना — उकठा का इलाज खड़ी फसल में नहीं है, सिर्फ़ बीज पर है।
- हर साल उसी खेत में चना — उकठा का फफूंद मिट्टी में जमा होता जाता है। कम से कम 3 साल का फसल चक्र अपनाएँ।
- फूल आते समय भारी सिंचाई — फूल झड़ जाते हैं और पौधा सिर्फ़ पत्ती-डंठल बढ़ाता है।
- फली छेदक का इंतज़ार करना — फेरोमोन ट्रैप में कीट दिखते ही कार्रवाई करें; फली में छेद दिखने के बाद नुकसान हो चुका होता है।
- नमी नापे बिना कटाई और भंडारण — 10–12% से ज़्यादा नमी पर भंडारण करने से घुन और फफूंद लग जाती है।
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चने का पूरा कैलेंडर — कब क्या करें
| समय | ज़रूरी काम |
| सितंबर – अक्टूबर की शुरुआत | खेत की तैयारी, बीज व राइजोबियम कल्चर की व्यवस्था, मिट्टी जांच |
| 15 अक्टूबर – 15 नवंबर | बुवाई — बीज उपचार के साथ, DAP कूंड़ में |
| बुवाई + 30–40 दिन | खुटाई (निपिंग), पहली निराई-गुड़ाई |
| बुवाई + 40–45 दिन | पहली सिंचाई (शाखा निकलते समय) |
| दिसंबर – जनवरी | फेरोमोन ट्रैप व बर्ड पर्च लगाएँ, फली छेदक की निगरानी शुरू |
| बुवाई + 70–75 दिन | दूसरी सिंचाई (फली भरते समय) |
| फरवरी | फली छेदक पर ज़रूरत हो तो छिड़काव, उकठा वाले पौधे उखाड़कर हटाएँ |
| मार्च | कटाई जब 80% फलियाँ भूरी हो जाएँ; गहाई, सुखाकर 10–12% नमी पर भंडारण |
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निष्कर्ष
तीन बातें याद रखें: चना 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच ही बोएं — देर से बोया चना 30–40% तक कम देता है; उकठा का पूरा इलाज बीज उपचार में है, खड़ी फसल में नहीं; और फली छेदक पर पहले बर्ड पर्च व फेरोमोन ट्रैप आज़माएँ, दवा बाद में।
चना उस किसान को इनाम देता है जो बुवाई से पहले सोचता है — बाद में सोचने वालों को यह फसल कुछ नहीं देती।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1चने की बुवाई का सही समय क्या है?
चने की बुवाई का सही समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर है — असिंचित खेत में अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में और सिंचित खेत में नवंबर के पहले पखवाड़े तक। दिसंबर में बोया गया चना आमतौर पर 30–40% तक कम पैदावार देता है, क्योंकि फूल आने का समय फरवरी की गर्मी से टकरा जाता है।
2एक हेक्टेयर में चने का कितना बीज लगता है?
देसी छोटे दाने वाली किस्म में 75–80 किलो प्रति हेक्टेयर और बड़े दाने वाली व काबुली किस्म में 100–125 किलो प्रति हेक्टेयर बीज लगता है। देर से बुवाई करनी पड़े तो बीज दर 15–20% बढ़ा दें, ताकि पौधों की संख्या पूरी रहे।
3क्या चने में यूरिया डालना चाहिए?
नहीं — चने को यूरिया की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि यह दलहनी फसल अपनी नाइट्रोजन खुद बनाती है। बुवाई के समय सिर्फ़ 15–20 किलो नाइट्रोजन का स्टार्टर डोज़ और 40–60 किलो फॉस्फोरस काफ़ी है, जो लगभग 100 किलो DAP प्रति हेक्टेयर से पूरा हो जाता है। ज़्यादा यूरिया देने से जड़ की नाइट्रोजन गांठें बनना घट जाता है।
4चने में उकठा (विल्ट) रोग का इलाज क्या है?
खड़ी फसल में उकठा का कोई असरदार इलाज नहीं है — इसका पूरा मुकाबला बुवाई से पहले बीज उपचार से होता है। बीज को ट्राइकोडर्मा विरिडी 5–10 ग्राम प्रति किलो से उपचारित करें, उकठा-सहनशील किस्म चुनें, और कम से कम 3 साल का फसल चक्र अपनाएँ ताकि मिट्टी में फफूंद जमा न हो।
5चने में कितनी सिंचाई करनी चाहिए?
सिंचित चने में सिर्फ़ दो सिंचाई काफ़ी हैं — पहली बुवाई के 40–45 दिन बाद शाखाएँ निकलते समय, और दूसरी 70–75 दिन बाद फलियाँ भरते समय। फूल आने के समय भारी सिंचाई न करें, इससे फूल झड़ जाते हैं। चने में ज़्यादा पानी कम पानी से ज़्यादा नुकसान करता है।
6चने में फली छेदक कीट की दवा कौन सी है?
फली छेदक पर इमामेक्टिन बेंज़ोएट 5 SG 4 ग्राम, क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5 SC 3 मि.ली. या स्पिनोसैड 45 SC 3 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी का छिड़काव किया जाता है। पर पहले बिना खर्च वाले उपाय आज़माएँ — 20–25 बर्ड पर्च और 5 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर। दवा हमेशा लेबल पर लिखी मात्रा से और शाम के समय दें।
7चने में खुटाई (निपिंग) क्यों की जाती है?
खुटाई बुवाई के 30–40 दिन बाद पौधे की ऊपरी नरम कोंपल तोड़ने को कहते हैं, जिससे पौधा ऊपर बढ़ने के बजाय बगल में ज़्यादा शाखाएँ निकालता है और फलियाँ बढ़ती हैं। यह बिना किसी लागत का उपाय है, पर देर से बोई गई फसल में खुटाई नहीं करनी चाहिए।
8देसी चना और काबुली चने में क्या फर्क है?
देसी चना छोटे भूरे दाने वाला, कम बीज (75–80 किलो/हेक्टेयर) में और रोग-सहनशील होता है, जबकि काबुली चना बड़े सफ़ेद दाने वाला, ज़्यादा बीज (100–125 किलो/हेक्टेयर) मांगता है और भाव ऊंचा देता है। अगर सिंचाई पक्की नहीं है तो देसी चना ही बोएं — काबुली को बेहतर दोमट ज़मीन और ज़्यादा सावधानी चाहिए।
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