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🌿 खरपतवार 🗓️ नवंबर–जनवरी 📍 पंजाब · हरियाणा · UP

गेहूं में गुल्ली डंडा Phalaris minor (Gulli Danda / Mandusi) in Wheat

गेहूं जैसी दिखने वाली यह घास खाद, पानी और रोशनी का बड़ा हिस्सा खा जाती है — और एक ही दवा बार-बार डालने से यह उसे सहना सीख चुकी है।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 10 मिनट पढ़ें 📅 अगस्त 2026

गेहूं की नकल करने वाला सबसे बड़ा खरपतवार

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गेहूं जैसा
इसीलिए पकड़ में नहीं आता
🗓️
30–35 दिन
छिड़काव का सही समय
🔄
अणु बदलें
प्रतिरोध से बचाव
📖

भूमिका

गेहूं के खेत में दूर से देखने पर सब कुछ हरा लगता है, पर पास जाकर देखिए — गेहूं जैसी ही दिखने वाली एक और घास उसके साथ-साथ खड़ी है, अक्सर उससे थोड़ी ज़्यादा ऊँची। यही है गुल्ली डंडा (Phalaris minor), जिसे अलग-अलग इलाकों में मंडूसी, कनकी, गेहूँसा भी कहा जाता है।

यह भारत के गेहूं क्षेत्र का सबसे बड़ा खरपतवार है, और इसकी सबसे खतरनाक बात यह है कि यह गेहूं की नकल करता है — शुरुआती अवस्था में किसान इसे पहचान ही नहीं पाता, और जब बाली निकलती है तब तक यह खाद, पानी और रोशनी का बड़ा हिस्सा खा चुका होता है। इससे भी बड़ी समस्या है प्रतिरोध (resistance): पंजाब-हरियाणा में आइसोप्रोट्यूरॉन जैसी दवा दशकों के इस्तेमाल के बाद पूरी तरह बेअसर हो चुकी है, और अब कई जगह नई दवाओं पर भी असर घट रहा है। इस लेख में पहचान का पक्का तरीका, बिना दवा के उपाय, कौन सी दवा कब, और प्रतिरोध से बचने का नियम — आसान हिंदी में।


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पहचान — गेहूं और गुल्ली डंडा में फर्क

शुरुआती अवस्था में दोनों बहुत मिलते-जुलते हैं, पर कुछ पक्के फर्क हैं जिन्हें एक बार सीख लेने के बाद आप खेत में खड़े-खड़े पहचान लेंगे:

पहचान बिंदु✅ गेहूं❌ गुल्ली डंडा
पत्ती का रंगगहरा हरा, थोड़ा खुरदराहल्का पीला-हरा, चिकनी और चमकदार
पत्ती की बनावटपत्ती पर हल्के बाल, छूने में रूखीपूरी तरह चिकनी, छूने में मुलायम
पत्ती का मुड़ावनई पत्ती लिपटी हुई (rolled)नई पत्ती मुड़ी हुई (folded)
तने का आधारसामान्यअक्सर हल्का बैंगनी-लाल रंग
ऊँचाईएक-सीअक्सर गेहूं से ऊपर निकल आता है
बालीचौड़ी, दाने वालीपतली, बेलनाकार, डंडे जैसी — इसीलिए नाम
💡
सबसे आसान जाँच — पत्ती को उँगलियों के बीच रगड़िए। गेहूं की पत्ती खुरदरी लगती है, गुल्ली डंडा की चिकनी और फिसलनदार। दूसरी जाँच — सुबह ओस में खेत देखिए, गुल्ली डंडा की चिकनी पत्तियों पर ओस की बूँदें अलग तरह से चमकती हैं और उसका हल्का रंग साफ अलग दिखता है।

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यह इतना नुकसान क्यों करता है?


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बिना दवा के उपाय — यही टिकाऊ रास्ता है

दवा अकेली इस खरपतवार को नहीं हरा सकती — यह पंजाब-हरियाणा का अनुभव साफ बता चुका है। असली नियंत्रण खेती के तरीकों से आता है:


🧪

खरपतवारनाशी — कौन सा, कब

खरपतवारनाशी दो तरह के होते हैं — बुवाई के तुरंत बाद (प्री-इमरजेंस) और खरपतवार उगने के बाद (पोस्ट-इमरजेंस)। गुल्ली डंडा के लिए सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले विकल्प:

दवा (तकनीकी नाम)कब डालेंटिप्पणी
पेंडीमेथालिन 30% ECबुवाई के 0–3 दिन के भीतरप्री-इमरजेंस; नम मिट्टी ज़रूरी
क्लोडिनाफॉप-प्रोपार्जिल 15% WPबुवाई के 30–35 दिन बादसिर्फ घास वाले खरपतवार पर
पिनोक्साडेन 5% ECबुवाई के 30–35 दिन बादघास वाले खरपतवार; अणु बदलने के लिए उपयोगी
सल्फोसल्फ्यूरॉन 75% WGबुवाई के 30–35 दिन बादघास + कुछ चौड़ी पत्ती; अगली फसल पर असर देखें
मेट्रीब्यूज़िन / मेटसल्फ्यूरॉन आधारित मिश्रणलेबल के अनुसारचौड़ी पत्ती वाले खरपतवार के साथ मिली-जुली समस्या में
⚠️
ऊपर दी गई जानकारी सामान्य अनुशंसा है — मात्रा हमेशा डिब्बे के लेबल से लें और देखें कि लेबल पर "गेहूं" और आपका खरपतवार लिखा हो (CIB&RC पंजीकरण)। खरपतवारनाशी की गलत मात्रा या गलत समय खुद गेहूं की फसल को जला सकता है, और कुछ दवाएँ अगली फसल पर भी असर छोड़ती हैं। अपने ज़िले के लिए अंतिम सिफारिश कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विभाग से पुष्टि करें। छिड़काव के समय दस्ताने, मास्क और पूरे कपड़े पहनें।

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प्रतिरोध से बचने का नियम

गुल्ली डंडा की कहानी भारत में प्रतिरोध की सबसे बड़ी मिसाल है। दशकों तक एक ही दवा (आइसोप्रोट्यूरॉन) चलाने के बाद वह पंजाब-हरियाणा में पूरी तरह बेअसर हो गई। वही गलती नई दवाओं के साथ दोहराई जा रही है।


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ये गलतियाँ कभी न करें


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कब क्या करें

समयज़रूरी काम
बुवाई से पहलेप्रमाणित/साफ बीज; फसल चक्र में बदलाव की योजना
बुवाई के 0–3 दिनज़रूरत हो तो प्री-इमरजेंस दवा (नम मिट्टी में)
15–20 दिनखेत का चक्कर — पत्ती रगड़कर पहचान की जाँच
पहली सिंचाई के बादखरपतवार तेज़ी से निकलता है — सबसे ज़रूरी निगरानी
30–35 दिनपोस्ट-इमरजेंस छिड़काव, फ्लैट फैन नोज़ल से, पूरी मात्रा में
बाली आने से पहलेबचे हुए पौधे हाथ से उखाड़कर खेत से बाहर करें
कटाई के बादमेड़-नाली की सफाई; अगले साल के लिए अणु बदलने की योजना

निष्कर्ष

गुल्ली डंडा दवा से नहीं, दवा + खेती के तरीकों से हारता है। तीन बातें याद रखिए: पत्ती रगड़कर जल्दी पहचानें — गेहूं खुरदरी, गुल्ली डंडा चिकनी, छिड़काव 2–4 पत्ती की अवस्था में, नम मिट्टी और पूरी मात्रा के साथ, और हर साल अणु बदलें, सिर्फ ब्रांड नहीं

छिड़काव के बाद जो पौधे ज़िंदा बचे हैं, वही अगले साल की असली समस्या हैं — उन्हें बीज बनने से पहले उखाड़ दीजिए।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1गेहूं और गुल्ली डंडा में फर्क कैसे पहचानें?
सबसे आसान जाँच है — पत्ती को उँगलियों के बीच रगड़िए: गेहूं की पत्ती खुरदरी लगती है और गुल्ली डंडा की चिकनी व फिसलनदार। इसके अलावा गुल्ली डंडा का रंग हल्का पीला-हरा होता है, तने का आधार अक्सर बैंगनी-लाल दिखता है, और वह गेहूं से ऊपर निकल आता है। बाली पतली, बेलनाकार और डंडे जैसी होती है — इसी से इसका नाम पड़ा।
2गुल्ली डंडा की सबसे असरदार दवा कौन सी है?
गेहूं में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले विकल्प हैं — बुवाई के 0–3 दिन में पेंडीमेथालिन 30% EC, और बुवाई के 30–35 दिन बाद क्लोडिनाफॉप-प्रोपार्जिल 15% WP, पिनोक्साडेन 5% EC या सल्फोसल्फ्यूरॉन 75% WGमात्रा हमेशा डिब्बे के लेबल से लें और लेबल पर गेहूं तथा आपका खरपतवार लिखा हो। अंतिम सिफारिश अपने KVK या कृषि विभाग से पुष्टि करें।
3गुल्ली डंडा की दवा कब छिड़कनी चाहिए?
पोस्ट-इमरजेंस दवा का सही समय है बुवाई के लगभग 30–35 दिन बाद, जब खरपतवार 2–4 पत्ती की अवस्था में हो। खरपतवार जितना छोटा होगा, असर उतना ज़्यादा होगा — बड़ा हो जाने के बाद वही दवा बेअसर लगती है। मिट्टी में नमी होना ज़रूरी है, और छिड़काव फ्लैट फैन या फ्लड जेट नोज़ल से, लेबल पर लिखी पूरी पानी की मात्रा के साथ करें।
4गुल्ली डंडा पर दवा असर क्यों नहीं कर रही?
इसकी चार आम वजहें हैं — प्रतिरोध (एक ही दवा बार-बार डालने से खरपतवार उसे सहन करना सीख जाता है), खरपतवार का बहुत बड़ा हो जाना, सूखी मिट्टी में छिड़काव, और कम मात्रा या कम पानी। पंजाब-हरियाणा में आइसोप्रोट्यूरॉन इसी तरह पूरी तरह बेअसर हो चुकी है। बचाव है — हर साल अणु (तकनीकी नाम) बदलना, सिर्फ ब्रांड नहीं, और पूरी मात्रा देना।
5बिना दवा के गुल्ली डंडा कैसे कम करें?
सबसे असरदार उपाय हैं — प्रमाणित या अच्छी तरह साफ किया हुआ बीज बोना (खरपतवार अक्सर आपकी अपनी बीज बोरी से आता है), फसल चक्र बदलना (धान-गेहूं के बीच बरसीम, सरसों, आलू या चना डालना), ज़ीरो टिलेज/हैप्पी सीडर से बुवाई, समय पर बुवाई, ज़्यादा बीज दर, और बचे हुए पौधों को बीज बनने से पहले हाथ से उखाड़ना
6गुल्ली डंडा के बीज मिट्टी में कितने साल ज़िंदा रहते हैं?
एक पौधा हज़ारों बीज छोड़ता है और वे मिट्टी में कई साल तक ज़िंदा रह सकते हैं। यही वजह है कि एक साल की लापरवाही कई साल भुगतनी पड़ती है, और यही कारण है कि बीज बनने से पहले बचे हुए पौधे उखाड़ना पूरे प्रबंधन का सबसे कीमती काम है। मेड़ और नाली के पौधे भी हर साल पूरे खेत में बीज भेजते रहते हैं, इसलिए वहाँ की सफाई भी ज़रूरी है।
7क्या दो खरपतवारनाशी मिलाकर छिड़क सकते हैं?
अपने मन से नहीं — सिर्फ वही मिश्रण इस्तेमाल करें जो लेबल पर लिखा हो। गलत मिश्रण से गेहूं की फसल खुद जल सकती है, और कुछ संयोजन एक-दूसरे का असर घटा देते हैं। अगर खेत में घास और चौड़ी पत्ती दोनों तरह के खरपतवार हैं, तो उसके लिए बने पंजीकृत मिश्रित उत्पाद उपलब्ध हैं — चुनाव से पहले अपने KVK या कृषि विभाग से पुष्टि करें।
8गुल्ली डंडा को मंडूसी और कनकी भी कहते हैं क्या?
हाँ — गुल्ली डंडा (Phalaris minor) को अलग-अलग इलाकों में मंडूसी, कनकी और गेहूँसा भी कहा जाता है, और अंग्रेज़ी में इसे Little Seed Canary Grass कहते हैं। नाम अलग हैं, पर खरपतवार एक ही है — भारत के गेहूं क्षेत्र का सबसे बड़ा खरपतवार, जो गेहूं की नकल करके उसके साथ-साथ उगता है और खाद, पानी तथा रोशनी का बड़ा हिस्सा खा जाता है।
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