इंदौर की एक डेयरी इकाई में बँधी गायें। तस्वीर में रोग के लक्षण नहीं हैं — यह वही झुंड है जिसे एक छूटा हुआ टीका ख़तरे में डालता है।
इलाज नहीं है — इसलिए टीका ही पूरा इलाज है
🌡️
104–106°F
अचानक तेज़ बुख़ार
💉
हर 6 महीने
टीका — मुफ़्त
🐄
4 माह
बछड़े का पहला टीका
📖
भूमिका
पशु का मुँह से लार टपकना, चारा छोड़ देना, लंगड़ाकर चलना और दूध का अचानक आधा रह जाना — गाँव में इसे "मुँह-खुर आ गया" कहते हैं। इसका पूरा नाम है खुरपका-मुँहपका रोग (FMD — फुट एंड माउथ डिज़ीज़), और यह गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सूअर — यानी दो खुर वाले हर पशु को पकड़ता है।
इस रोग के बारे में सबसे ज़रूरी बात यही है: इसका कोई इलाज नहीं है। दवा सिर्फ़ घावों को बिगड़ने से रोकती है, वायरस को नहीं मारती। बचाव का एक ही रास्ता है — हर छह महीने पर टीका, जो सरकार के पशुधन स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत मुफ़्त लगता है। और नुकसान छोटा नहीं है: शोध अनुमानों में देश को इस एक बीमारी से हर साल लगभग ₹18,000–20,000 करोड़ का नुकसान बताया गया है, जिसका सबसे बड़ा हिस्सा घटा हुआ दूध है।
विज्ञापन
🦠
यह रोग है क्या, और फैलता कैसे है
यह एक विषाणु (वायरस) से होने वाला रोग है। भारत में जो टीका लगाया जाता है वह वायरस के तीन प्रकारों — O, A और Asia-1 — के विरुद्ध बनता है, इसीलिए उसे त्रिसंयोजी (ट्राईवैलेंट) टीका कहते हैं।
हवा और सीधे संपर्क से: बीमार पशु की लार, नाक का पानी, गोबर और छालों का पानी — सब में वायरस रहता है। एक बाड़े में एक पशु बीमार हुआ तो बाक़ी का बचना मुश्किल है।
साझा नाँद और पानी की टंकी से: गाँव की एक ही चरही या हौद पूरे गाँव में रोग फैलाने का सबसे तेज़ रास्ता है।
आदमी, जूते और गाड़ी से: वायरस कपड़ों, जूतों, दूध के बर्तन और पशु ढोने वाली गाड़ी के साथ एक बाड़े से दूसरे बाड़े जाता है।
नया ख़रीदा पशु: मेले या बाज़ार से लाया गया पशु सबसे आम रास्ता है। वह ख़ुद ठीक दिख सकता है और फिर भी वायरस साथ ला सकता है।
💡
ठंड और नमी के मौसम में यह रोग ज़्यादा फैलता है, इसलिए टीकाकरण के दौर आमतौर पर बरसात के बाद और सर्दी से पहले, तथा दूसरा दौर वसंत में चलाए जाते हैं। आपके ज़िले में इस बार दौर कब है, यह अपने पशु चिकित्सालय से पूछ लीजिए।
🔍
पहचान — स्वस्थ पशु और ग्रस्त पशु
पहचान बिंदु
✅ स्वस्थ पशु
❌ खुरपका-मुँहपका
बुख़ार
सामान्य
अचानक तेज़ बुख़ार, 104–106°F तक
मुँह
साफ़, चारा चबाता है
जीभ, मसूड़े और होंठ के अंदर छाले, फिर घाव
लार
सामान्य
तार जैसी लार लगातार टपकती है, चपचप की आवाज़
खुर
सामान्य चाल
खुरों के बीच छाले-घाव, लंगड़ाना, खड़े होने में आनाकानी
चारा-पानी
रोज़ जैसा
खाना बंद, दर्द से जुगाली रुक जाती है
दूध
सामान्य
कुछ ही दिन में तेज़ गिरावट, कई पशु पूरी ब्यांत में वापस नहीं आते
बछड़े
चुस्त
बिना छाले दिखे अचानक मौत — वायरस दिल पर असर करता है
⚠️
छोटे बछड़े-पाड़े इस रोग में सबसे ज़्यादा जान गँवाते हैं, और अक्सर मुँह या खुर में छाले दिखे बिना ही। इसलिए बाड़े में किसी बड़े पशु को मुँहपका हो और बछड़ा सुस्त लगे, तो इंतज़ार मत कीजिए — तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाइए।
विज्ञापन
📉
असली नुकसान बीमारी के बाद शुरू होता है
ज़्यादातर बड़े पशु इस रोग से मरते नहीं — और यही बात इसे कम आँकने की वजह बन जाती है। पशु ठीक दिखने लगता है, पर धंधा उससे कभी पूरा नहीं उबरता।
दूध वापस नहीं आता: बीमारी के दिनों में उत्पादन गिरता ही है, पर कई पशु उस पूरी ब्यांत में पहले वाले स्तर पर लौटते ही नहीं। शोध में कुल नुकसान का सबसे बड़ा हिस्सा यही दूध का नुकसान बताया गया है।
गाभिन पशु का गर्भपात: तेज़ बुख़ार की अवस्था में गर्भपात आम है।
बार-बार फिरना, देर से गाभिन होना: प्रजनन गड़बड़ाता है, और एक ब्यांत का देर होना सीधे साल भर के दूध का नुकसान है।
हाँफने वाला पशु ("पैंटर"): ठीक होने के बाद कुछ पशु गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाते, छाँव में भी हाँफते रहते हैं और कभी पूरी ताक़त पर नहीं आते।
खुर की स्थायी ख़राबी: घाव भरने के बाद भी खुर टेढ़ा रह सकता है — बैल के लिए यह काम की क्षमता का सीधा नुकसान है।
💉
टीकाकरण — पूरा लेख इसी हिस्से के लिए है
खुरपका-मुँहपका से बचाव का इकलौता भरोसेमंद तरीका टीका है, और यह पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत सरकार की ओर से मुफ़्त लगाया जाता है। इसका ख़र्च केंद्र सरकार उठाती है — गाँव में टीके के नाम पर पैसा माँगा जाए तो पशु चिकित्सालय में शिकायत कीजिए।
बात
नियम
किन पशुओं को
गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर — सभी
पहला टीका
बछड़े-पाड़े को 4 माह की उम्र पर
बूस्टर
पहले टीके के लगभग एक महीने बाद
उसके बाद
हर छह महीने पर, जीवन भर
टीके से पहले
लगभग एक महीने पहले कृमिनाशक (पेट के कीड़ों की दवा) दिलवाइए
पहचान
कान का टैग और पशु का पंजीयन — रिकॉर्ड इसी से जुड़ता है
रिकॉर्ड
टीके की तारीख़ पशु स्वास्थ्य कार्ड/पोर्टल पर दर्ज कराइए
ख़र्च
कुछ नहीं — केंद्र सरकार वहन करती है
कार्यक्रम का असर आँकड़ों में दिखता है: सरकार के अनुसार अब तक 147 करोड़ से ज़्यादा टीके लगाए जा चुके हैं, लगभग 8 करोड़ पशुपालक इससे जुड़े हैं, और खुरपका-मुँहपका के प्रकोप 2019 के मुक़ाबले कई गुना घटे हैं। यह तभी काम करता है जब गाँव के सारे पशु टीका पाएँ — छूटा हुआ पशु पूरे गाँव के लिए खुला दरवाज़ा है।
⚠️
टीके का असर कुछ महीनों तक ही रहता है, इसलिए "पिछले साल लगवाया था" काफ़ी नहीं है। दौर की तारीख़, टीके की उपलब्धता और आपके ज़िले की व्यवस्था अपने नज़दीकी पशु चिकित्सालय या पशुधन सहायक से पूछकर तय कीजिए।
❌
टीके के बारे में चार आम ग़लतफ़हमियाँ
"टीका लगने से दूध घट जाता है": टीके के बाद एक-दो दिन हल्की सुस्ती या मामूली गिरावट हो सकती है और वह अपने आप ठीक हो जाती है। रोग हो जाने पर होने वाला नुकसान इससे कई गुना बड़ा और कई महीनों लंबा होता है।
"गाभिन पशु को टीका नहीं लगता": गाभिन पशु का टीका छोड़ना उसे और उसके होने वाले बछड़े दोनों को खुला छोड़ना है। अवस्था बताकर पशु चिकित्सक की राय लीजिए — फ़ैसला वही करेंगे, पड़ोसी नहीं।
"एक बार लगवा दिया, अब ज़रूरत नहीं": यह टीका जीवन भर का नहीं है। हर छह महीने पर दोहराना ही इसका पूरा तरीका है।
"बीमारी आ चुकी है, अब टीका लगवा लेते हैं": बीमार पशु को टीका नहीं लगाया जाता। बाड़े में रोग आने के बाद टीका उसे नहीं रोक सकता — यही वजह है कि टीका दौर पर, समय से लगवाना ज़रूरी है।
🩹
बीमार पशु की देखभाल — दवा नहीं, सहारा
वायरस को मारने वाली कोई दवा नहीं है। जो कुछ किया जाता है वह पशु को दर्द, भूख और दूसरे संक्रमण से बचाने के लिए होता है, ताकि वह ख़ुद लड़ सके।
मुँह की सफ़ाई: मुँह को हल्के एंटीसेप्टिक घोल (जैसे 1% पोटैशियम परमैंगनेट) से दिन में दो बार धोना घावों को बिगड़ने से रोकता है।
नरम आहार: सूखा भूसा और खल घाव पर चुभते हैं। दलिया, चावल का माँड़, गुड़ का पानी और मुलायम हरा चारा दीजिए।
खुर की देखभाल: खुर को साफ़ पानी से धोकर सुखाइए, कीचड़ और गोबर से दूर सूखे-साफ़ फ़र्श पर रखिए। खुले घाव पर मक्खी बैठने से कीड़े पड़ जाते हैं — यही ज़्यादातर मामलों में हालत बिगाड़ता है।
अलग बाँधिए: बीमार पशु को अलग रखिए, उसका चारा-पानी अलग कीजिए, और बाड़े का काम करते समय उसे सबसे आख़िर में संभालिए।
चिकित्सक को बुलाइए: बुख़ार, दूसरे जीवाणु संक्रमण या घाव बिगड़ने पर दवा की ज़रूरत पड़ सकती है — वह पशु चिकित्सक तय करेंगे।
⚠️
अपने मन से एंटीबायोटिक या दर्द की दवा मत दीजिए। कोई भी घोल, मरहम या इंजेक्शन पशु चिकित्सक की सलाह और बताई गई मात्रा से ही इस्तेमाल कीजिए — दूध देने वाले पशु में दवा की निकासी अवधि (कितने दिन दूध न बेचें) का पालन भी ज़रूरी है। घरेलू नुस्ख़ों में तेज़ रसायन डालने से घाव और गहरा हो जाता है।
🛡️
बिना पैसे ख़र्च किए फैलाव रोकिए
नया पशु 21 दिन अलग रखिए: मेले या बाज़ार से लाया गया पशु सीधे बाड़े में मत बाँधिए। तीन हफ़्ते की यह अलग-थलग रखने की आदत सबसे सस्ता बचाव है।
साझा हौद और चरही से बचिए: प्रकोप के दिनों में गाँव की साझा पानी की टंकी पूरे गाँव को जोड़ देती है।
बाड़े में आने-जाने वालों को सीमित कीजिए: व्यापारी, दूध लेने वाले और पशु ढोने वाली गाड़ी — तीनों वायरस साथ ला सकते हैं।
बर्तन और फ़र्श धोइए: बाड़ा, नाँद और बाल्टी की नियमित सफ़ाई और चूने की पुताई रखिए; प्रकोप के समय पशु चिकित्सक से उपयुक्त कीटाणुनाशक पूछ लीजिए।
प्रकोप के समय पशु बाहर मत ले जाइए: बीमारी वाले गाँव से पशु मेले या दूसरे गाँव भेजना ही रोग को ज़िले भर में फैलाता है।
रोग की सूचना दीजिए: गाँव में कई पशुओं में एक साथ लार और लंगड़ाहट दिखे तो पशु चिकित्सालय को तुरंत बताइए — दौर के बाहर भी टीकाकरण की व्यवस्था हो सकती है।
🚫
ये गलतियाँ कभी न करें
टीके का दौर छोड़ देना — "इस बार पशु ठीक है" सोचकर छोड़ा गया पशु अगले प्रकोप में सबसे पहले पकड़ में आता है।
बीमार पशु को उसी नाँद पर बाँधे रखना — एक बाड़े में एक पशु का मतलब कुछ ही दिन में पूरा बाड़ा है।
नया ख़रीदा पशु सीधे झुंड में बाँध देना — 21 दिन की अलग व्यवस्था हर बार, बिना अपवाद।
घाव पर तेज़ रसायन या जला हुआ तेल लगाना — इससे घाव भरता नहीं, गहरा होता है।
बछड़े की सुस्ती को हल्के में लेना — छालों के बिना भी बछड़े इसी रोग से मरते हैं।
कान का टैग निकाल देना — टीके, बीमे और सरकारी योजनाओं का रिकॉर्ड उसी पहचान संख्या से जुड़ता है।
📅
कब क्या करें
कब
क्या
बछड़े के 4 माह पर
पहला FMD टीका
उसके एक महीने बाद
बूस्टर ख़ुराक
हर छह महीने
दोहराव टीका — घर के हर पशु को
टीके से एक महीना पहले
कृमिनाशक दवा
नया पशु ख़रीदते ही
21 दिन अलग, फिर झुंड में
रोग दिखते ही
पशु अलग, चिकित्सालय को सूचना, नरम आहार
ठीक होने के बाद
कमज़ोरी और गर्मी न सह पाने पर चिकित्सक से जाँच
✅
निष्कर्ष
तीन बातें याद रखिए। पहली — इलाज नहीं है, दवा सिर्फ़ सहारा देती है। दूसरी — टीका हर छह महीने पर, और मुफ़्त है; एक बार लगवा देना काफ़ी नहीं। तीसरी — नुकसान बीमारी के बाद चलता है: गिरा दूध, गर्भपात और देर से गाभिन होना, जो सालों की कमाई खाते हैं।
खुरपका-मुँहपका उस दिन नहीं हारता जिस दिन इलाज शुरू होता है — उस दिन हारता है जिस दिन टीके का दौर आपके गाँव से बिना किसी छूटे पशु के गुज़र जाता है।
विज्ञापन
❓
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1खुरपका-मुँहपका रोग का टीका कब और कितनी बार लगवाना चाहिए?
पहला टीका बछड़े-पाड़े को 4 माह की उम्र पर, उसके लगभग एक महीने बाद बूस्टर, और फिर हर छह महीने पर जीवन भर। यह टीका सरकार के पशुधन स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत मुफ़्त लगता है और इसमें गाय, भैंस, भेड़, बकरी तथा सूअर सभी शामिल हैं।
2क्या खुरपका-मुँहपका रोग का कोई इलाज है?
नहीं, इस रोग का कोई इलाज नहीं है — दवा सिर्फ़ घाव, बुख़ार और दूसरे संक्रमणों को संभालती है, वायरस को नहीं मारती। बचाव का इकलौता भरोसेमंद तरीका हर छह महीने पर लगने वाला टीका है।
3खुरपका-मुँहपका के लक्षण क्या होते हैं?
अचानक 104–106°F तक तेज़ बुख़ार, मुँह और जीभ पर छाले, तार जैसी लगातार टपकती लार, खुरों के बीच घाव और लंगड़ाहट, चारा छोड़ देना और दूध में तेज़ गिरावट। छोटे बछड़ों में छाले दिखे बिना भी अचानक मौत हो सकती है क्योंकि वायरस दिल पर असर करता है।
4क्या FMD का टीका मुफ़्त है?
हाँ, FMD का टीका पूरी तरह मुफ़्त है — इसका ख़र्च केंद्र सरकार वहन करती है और यह पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत लगाया जाता है। टीके के नाम पर पैसा माँगा जाए तो नज़दीकी पशु चिकित्सालय में शिकायत कीजिए।
5क्या गाभिन गाय-भैंस को खुरपका का टीका लगाया जा सकता है?
गाभिन पशु को टीके से बाहर रखना ग़लत है, क्योंकि रोग होने पर गर्भपात का ख़तरा टीके से कहीं बड़ा है। पशु की अवस्था बताकर पशु चिकित्सक की सलाह से टीका लगवाइए — फ़ैसला वही करेंगे।
6बीमार पशु को क्या खिलाएँ?
सूखा भूसा और खल घाव पर चुभते हैं, इसलिए दलिया, चावल का माँड़, गुड़ का पानी और मुलायम हरा चारा दीजिए। मुँह को हल्के एंटीसेप्टिक घोल से दिन में दो बार धोइए और खुर साफ़-सूखी जगह पर रखिए, ताकि घाव में मक्खी और कीड़े न पड़ें।
7नया पशु ख़रीदने पर कितने दिन अलग रखना चाहिए?
नया ख़रीदा पशु कम से कम 21 दिन अलग रखना चाहिए, चाहे वह देखने में पूरी तरह स्वस्थ लगे। मेले या बाज़ार से आया पशु ही बाड़े में रोग आने का सबसे आम रास्ता है।
8ठीक होने के बाद भी पशु का दूध पहले जैसा क्यों नहीं होता?
खुरपका-मुँहपका का सबसे बड़ा नुकसान बीमारी के बाद रहता है — कई पशु उस पूरी ब्यांत में पहले वाले दूध पर वापस नहीं आते, कुछ में गर्भपात या देर से गाभिन होने की समस्या रहती है, और कुछ गर्मी सहन नहीं कर पाते और हाँफते रहते हैं। इसी वजह से इस रोग का आर्थिक नुकसान इतना बड़ा आँका जाता है।
🌾
KrashiMitra.in — आपका विश्वसनीय कृषि साथी
मंडी भाव, सरकारी योजनाएं, बीज-खाद की जानकारी और फसल रोग उपचार — सब कुछ हिंदी में।