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🦠 सफेद रतुआ 🗓️ दिसंबर–जनवरी 🌼 सरसों

सरसों में सफेद रतुआ White Rust in Mustard

पत्ती के नीचे सफेद फफोले दिखें तो यह सफेद रतुआ है। असली नुकसान तब होता है जब फूल की डंडी मुड़कर गुच्छा बन जाती है — उस डंडी से एक भी दाना नहीं मिलता।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 9 मिनट पढ़ें 📅 सितंबर 2026

यह तना गलन नहीं है — दवा खरीदने से पहले फर्क पहचानिए

📉
शून्य
विकृत डंडी की उपज
🧪
2 ग्राम
मैंकोजेब प्रति लीटर पानी
🌱
6 ग्राम
मेटालैक्सिल प्रति किलो बीज
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भूमिका

दिसंबर की धुंध और ओस के दिनों में सरसों की पत्ती पलटकर देखिए। नीचे की सतह पर सफेद, चमकदार, उभरे हुए फफोले दिखें तो वह सफेद रतुआ है — कहीं इसे सफेद गेरुई कहते हैं, कहीं तुलासिता। यह रोग अकेले पत्तियों तक रहे तो नुकसान थोड़ा होता है, लेकिन जब यह तने के रास्ते ऊपर चढ़कर फूल की डंडी में पहुँच जाता है, तो फूल फली बनने के बजाय मोटा, मुड़ा हुआ, हरा-भूरा गुच्छा बन जाता है — और उस डंडी से एक भी दाना नहीं मिलता।

किसान की सबसे आम गलती यह है कि इसे तना गलन या झुलसा समझकर गलत दवा डाल दी जाती है। तीनों रोग एक ही महीने में आते हैं, तीनों में पौधा सूखता है, पर तीनों की दवा अलग है। यह लेख पहले पहचान का फर्क साफ करता है, फिर बुवाई के दिन से लेकर छिड़काव तक का पूरा क्रम देता है।


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🔍

सफेद रतुआ क्या है और दो रूपों में कैसे आता है

यह रोग एल्बूगो कैंडिडा नाम की फफूँद से होता है और सरसों, राई, तोरिया तथा दूसरी सरसों-कुल की फसलों पर लगता है। यह फसल पर दो अलग-अलग रूपों में दिखता है, और नुकसान का पूरा फर्क इसी में है।

💡
सफेद रतुआ को ठंडी, नम, ओस वाली रातें और 15–20°C का तापमान सबसे ज़्यादा भाता है। लगातार धुंध वाले हफ्ते के बाद रोग तेज़ी से बढ़ता है — यही निगरानी बढ़ाने का इशारा है।

📊

स्वस्थ और ग्रस्त पौधे का फर्क

पहचान बिंदु✅ स्वस्थ पौधा❌ सफेद रतुआ ग्रस्त
पत्ती की निचली सतहएक जैसी हरी, चिकनीसफेद उभरे फफोले, दबाने पर चूर्ण
पत्ती की ऊपरी सतहसाफ हरीफफोले के ठीक ऊपर पीले धब्बे
फूल की डंडीपतली, सीधी, फली लगती हैमोटी, मुड़ी, हरा-भूरा गुच्छा
फलीसीधी, दाने भरीबनती ही नहीं या टेढ़ी-खाली
उस डंडी की उपजपूरीलगभग शून्य

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सफेद रतुआ, झुलसा और तना गलन — तीनों में फर्क

सरसों में तीन रोग लगभग एक ही समय आते हैं और तीनों में पौधा कमज़ोर पड़ता है। दवा खरीदने से पहले यह तालिका एक बार पढ़ लीजिए।

लक्षणसफेद रतुआझुलसा (आल्टरनेरिया)तना गलन (स्क्लेरोशिनिया)
मुख्य निशानपत्ती के नीचे सफेद उभरे फफोलेपत्ती पर गोल भूरे-काले छल्लेदार धब्बेतने पर सफेद रुई और अंदर काले दाने
कहाँ से शुरूनीचे की पत्तियाँनीचे की पत्तियाँ, फिर फलीतने का बीच वाला हिस्सा
फूल पर असरडंडी मोटी-मुड़ी, गुच्छा बनता हैफली पर धब्बे, दाना सिकुड़ता हैपूरा पौधा ऊपर से सूख जाता है
मुख्य दवामैंकोजेब / मेटालैक्सिल+मैंकोजेबमैंकोजेबकार्बेन्डाजिम

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बिना पैसे खर्च किए रोकथाम

इस रोग में दवा से ज़्यादा काम खेत की आदतें करती हैं, क्योंकि फफूँद खेत में ही बचती है और अगले साल फिर वहीं से शुरू होती है।


🧪

बीज उपचार और छिड़काव — कौन सी दवा, कितनी

सबसे सस्ता बचाव बुवाई के दिन होता है। बीज उपचार शुरुआती संक्रमण को रोक देता है, और छिड़काव उसके बाद की सुरक्षा है।

अवस्थादवामात्रा
बुवाई से पहले (बीज उपचार)मेटालैक्सिल 35% SD6 ग्राम प्रति किलो बीज
पहला लक्षण दिखते हीमैंकोजेब 75% WP2 ग्राम प्रति लीटर पानी (0.2%)
15 दिन बाद दोहरावमैंकोजेब 75% WP2 ग्राम प्रति लीटर पानी
तेज़ प्रकोप / स्टैगहेड दिखने परमेटालैक्सिल + मैंकोजेब (संयुक्त)2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी

छिड़काव करते समय घोल पत्ती की निचली सतह तक पहुँचना चाहिए, क्योंकि फफोले वहीं बनते हैं। नोज़ल को ऊपर की ओर करके, धीरे चलते हुए छिड़किए और घोल में चिपकने वाला पदार्थ (स्टिकर) मिला लीजिए — सरसों की पत्ती पर पानी टिकता नहीं।

⚠️
ये सामान्य सिफारिशें हैं; राज्यवार पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज़ में दवा और मात्रा अलग हो सकती है। खरीदने से पहले डिब्बे का CIB&RC लेबल पढ़िए और नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से पुष्टि कीजिए। किस्म का चुनाव भी राज्य के कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश से ही कीजिए — रोग-सह किस्में क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग हैं।

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किस्म और बीज — सबसे सस्ता बीमा


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ये गलतियाँ कभी न करें


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कब क्या करें

समयज़रूरी काम
सितंबर के आखिररोग-सह किस्म और प्रमाणित बीज का इंतज़ाम
बुवाई से 1 दिन पहलेमेटालैक्सिल 35% SD, 6 ग्राम प्रति किलो बीज
अक्टूबर का पहला पखवाड़ासमय से बुवाई — देर करने पर रोग बढ़ता है
40–45 दिन (दिसंबर)पत्ती पलटकर निचली सतह की जाँच शुरू
पहला फफोला दिखते हीमैंकोजेब 2 ग्राम/लीटर, स्टिकर के साथ
15 दिन बाददूसरा छिड़काव; धुंध वाले हफ्ते में ज़रूर
फूल की अवस्थाविकृत गुच्छे तोड़कर खेत से बाहर नष्ट करें
कटाई के बादअवशेष हटाएँ, गहरी जुताई; अगले साल फसल बदलें

निष्कर्ष

तीन बातें याद रखिए। पहली — पहचान पत्ती की निचली सतह पर होती है, ऊपर से देखकर नहीं। दूसरी — असली नुकसान फूल की मुड़ी डंडी से होता है, और वह डंडी एक भी दाना नहीं देती। तीसरी — समय से बुवाई, बीज उपचार और विकृत गुच्छे नष्ट करना — तीनों मिलकर दवा से ज़्यादा काम करते हैं

सफेद रतुआ खेत में सोता है और हर दिसंबर जागता है — उसे बुवाई के दिन ही रोक दीजिए।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1सरसों में सफेद रतुआ की दवा कौन सी है?
पहला लक्षण दिखते ही मैंकोजेब 75% WP की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी (0.2%) की दर से छिड़काव कीजिए और 15 दिन बाद दोहराइए; तेज़ प्रकोप में मेटालैक्सिल + मैंकोजेब का संयुक्त फफूँदनाशक 2.5 ग्राम प्रति लीटर उपयोग किया जाता है। बुवाई से पहले बीज को मेटालैक्सिल 35% SD की 6 ग्राम प्रति किलो की दर से उपचारित करना सबसे सस्ता बचाव है।
2सरसों में सफेद रतुआ की पहचान कैसे करें?
पत्ती की निचली सतह पर सफेद, उभरे हुए, चूर्ण वाले फफोले इसकी पक्की पहचान हैं, और उन्हीं फफोलों के ठीक ऊपर पत्ती की ऊपरी सतह पर पीले धब्बे बनते हैं। बाद में फूल की डंडी मोटी होकर मुड़ जाती है और हिरण के सींग जैसा गुच्छा बना देती है, जिसे स्टैगहेड कहते हैं।
3सफेद रतुआ और तना गलन में क्या फर्क है?
सफेद रतुआ पत्ती की निचली सतह पर सफेद फफोले बनाता है, जबकि तना गलन में तने पर रुई जैसी सफेद परत और उसके अंदर काले सरसों जैसे दाने मिलते हैं। दोनों की दवा भी अलग है — सफेद रतुआ में मैंकोजेब या मेटालैक्सिल+मैंकोजेब, और तना गलन में कार्बेन्डाजिम।
4स्टैगहेड यानी विकृत फूल का क्या करें?
दिखते ही उन्हें काटकर खेत से बाहर ले जाकर जला दीजिए। उस डंडी से वैसे भी एक भी दाना नहीं मिलेगा, और उसी विकृत गुच्छे में फफूँद के लाखों बीजाणु बनते हैं जो खेत में गिरकर अगले साल की फसल को संक्रमित करते हैं।
5सफेद रतुआ किस मौसम में ज़्यादा लगता है?
ठंडी, नम और ओस वाली रातों में, जब तापमान 15–20°C के आसपास रहता है — यानी दिसंबर-जनवरी की धुंध वाली अवधि में। लगातार कई दिन की धुंध या बेमौसम बारिश के बाद रोग सबसे तेज़ी से बढ़ता है, इसलिए ऐसे हफ्ते में खेत की जाँच बढ़ा दीजिए।
6क्या देर से बुवाई करने पर सफेद रतुआ ज़्यादा लगता है?
हाँ — देर से बोई सरसों में रोग की गंभीरता लगातार बढ़ती जाती है। देर से बोई फसल का नाज़ुक फूल-फली वाला समय उन्हीं ठंडी-नम रातों पर पड़ता है जो फफूँद के लिए सबसे अनुकूल हैं, जबकि अक्टूबर के पहले पखवाड़े की बुवाई में यह अवस्था अपेक्षाकृत सुरक्षित निकल जाती है।
7सफेद रतुआ से बचने के लिए बीज उपचार कैसे करें?
बुवाई से एक दिन पहले मेटालैक्सिल 35% SD की 6 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से बीज पर अच्छी तरह मिलाइए। क्रम याद रखिए — पहले फफूँदनाशक, फिर कीटनाशक और सबसे आखिर में जैविक कल्चर, वरना रासायनिक दवा कल्चर के जीवाणु मार देती है।
8क्या सफेद रतुआ से पूरी फसल खराब हो सकती है?
पूरी फसल आम तौर पर नहीं मरती, लेकिन जितनी फूल-डंडियाँ स्टैगहेड बन जाती हैं, उनकी उपज पूरी तरह शून्य हो जाती है। इसीलिए नुकसान का असली पैमाना पत्ती के फफोले नहीं, विकृत गुच्छों की गिनती है — और वही रोका जा सकता है, अगर बीज उपचार और समय पर छिड़काव हो।
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