फूल पर आई सरसों — रोग की जाँच इसी अवस्था में शुरू होती है। चित्र में स्वस्थ फसल है, रोग के लक्षण नहीं।
यह तना गलन नहीं है — दवा खरीदने से पहले फर्क पहचानिए
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शून्य
विकृत डंडी की उपज
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2 ग्राम
मैंकोजेब प्रति लीटर पानी
🌱
6 ग्राम
मेटालैक्सिल प्रति किलो बीज
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भूमिका
दिसंबर की धुंध और ओस के दिनों में सरसों की पत्ती पलटकर देखिए। नीचे की सतह पर सफेद, चमकदार, उभरे हुए फफोले दिखें तो वह सफेद रतुआ है — कहीं इसे सफेद गेरुई कहते हैं, कहीं तुलासिता। यह रोग अकेले पत्तियों तक रहे तो नुकसान थोड़ा होता है, लेकिन जब यह तने के रास्ते ऊपर चढ़कर फूल की डंडी में पहुँच जाता है, तो फूल फली बनने के बजाय मोटा, मुड़ा हुआ, हरा-भूरा गुच्छा बन जाता है — और उस डंडी से एक भी दाना नहीं मिलता।
किसान की सबसे आम गलती यह है कि इसे तना गलन या झुलसा समझकर गलत दवा डाल दी जाती है। तीनों रोग एक ही महीने में आते हैं, तीनों में पौधा सूखता है, पर तीनों की दवा अलग है। यह लेख पहले पहचान का फर्क साफ करता है, फिर बुवाई के दिन से लेकर छिड़काव तक का पूरा क्रम देता है।
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सफेद रतुआ क्या है और दो रूपों में कैसे आता है
यह रोग एल्बूगो कैंडिडा नाम की फफूँद से होता है और सरसों, राई, तोरिया तथा दूसरी सरसों-कुल की फसलों पर लगता है। यह फसल पर दो अलग-अलग रूपों में दिखता है, और नुकसान का पूरा फर्क इसी में है।
पहला रूप — पत्ती के फफोले: पत्ती की निचली सतह पर सफेद, दानेदार, उभरे हुए धब्बे। दबाने पर सफेद चूर्ण निकलता है। ऊपरी सतह पर उसी जगह हल्का पीलापन दिखता है। इस अवस्था में उपज पर असर सीमित रहता है।
दूसरा रूप — स्टैगहेड (विकृत फूल): फफूँद तने के रास्ते ऊपर चढ़कर फूल की डंडी में बैठ जाती है। डंडी मोटी होकर मुड़ जाती है और फूलों का गुच्छा हिरण के सींग जैसा दिखने लगता है। ऐसी हर डंडी की पूरी उपज शून्य हो जाती है — असली नुकसान यहीं होता है।
अक्सर साथ आने वाला रोग: मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू) इसी मौसम में और अक्सर इसी पौधे पर लगती है — पत्ती की नीचे की सतह पर रुई जैसी हल्की परत। दोनों की दवा काफी हद तक एक ही है।
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सफेद रतुआ को ठंडी, नम, ओस वाली रातें और 15–20°C का तापमान सबसे ज़्यादा भाता है। लगातार धुंध वाले हफ्ते के बाद रोग तेज़ी से बढ़ता है — यही निगरानी बढ़ाने का इशारा है।
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स्वस्थ और ग्रस्त पौधे का फर्क
पहचान बिंदु
✅ स्वस्थ पौधा
❌ सफेद रतुआ ग्रस्त
पत्ती की निचली सतह
एक जैसी हरी, चिकनी
सफेद उभरे फफोले, दबाने पर चूर्ण
पत्ती की ऊपरी सतह
साफ हरी
फफोले के ठीक ऊपर पीले धब्बे
फूल की डंडी
पतली, सीधी, फली लगती है
मोटी, मुड़ी, हरा-भूरा गुच्छा
फली
सीधी, दाने भरी
बनती ही नहीं या टेढ़ी-खाली
उस डंडी की उपज
पूरी
लगभग शून्य
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सफेद रतुआ, झुलसा और तना गलन — तीनों में फर्क
सरसों में तीन रोग लगभग एक ही समय आते हैं और तीनों में पौधा कमज़ोर पड़ता है। दवा खरीदने से पहले यह तालिका एक बार पढ़ लीजिए।
लक्षण
सफेद रतुआ
झुलसा (आल्टरनेरिया)
तना गलन (स्क्लेरोशिनिया)
मुख्य निशान
पत्ती के नीचे सफेद उभरे फफोले
पत्ती पर गोल भूरे-काले छल्लेदार धब्बे
तने पर सफेद रुई और अंदर काले दाने
कहाँ से शुरू
नीचे की पत्तियाँ
नीचे की पत्तियाँ, फिर फली
तने का बीच वाला हिस्सा
फूल पर असर
डंडी मोटी-मुड़ी, गुच्छा बनता है
फली पर धब्बे, दाना सिकुड़ता है
पूरा पौधा ऊपर से सूख जाता है
मुख्य दवा
मैंकोजेब / मेटालैक्सिल+मैंकोजेब
मैंकोजेब
कार्बेन्डाजिम
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बिना पैसे खर्च किए रोकथाम
इस रोग में दवा से ज़्यादा काम खेत की आदतें करती हैं, क्योंकि फफूँद खेत में ही बचती है और अगले साल फिर वहीं से शुरू होती है।
समय से बुवाई कीजिए: देर से बोई सरसों में यह रोग हमेशा ज़्यादा मिलता है — फसल का नाज़ुक समय उन्हीं ठंडी-नम रातों पर पड़ता है जो फफूँद को भाती हैं। अक्टूबर के पहले पखवाड़े की बुवाई में रोग की गंभीरता सबसे कम रहती है।
विकृत फूल-गुच्छे तोड़कर जला दीजिए: स्टैगहेड में ही फफूँद के लाखों बीजाणु बनते हैं। दिखते ही उन्हें काटकर खेत से बाहर नष्ट कीजिए — खेत में गिरा छोड़ना अगले साल का संक्रमण बोने जैसा है।
फसल चक्र अपनाइए: एक ही खेत में हर साल सरसों-राई-तोरिया न लीजिए। बीच में गेहूं, जौ या चना लेने से खेत में बची फफूँद भूखी मर जाती है।
खरपतवार हटाइए: जंगली सरसों और बथुआ जैसे सरसों-कुल के खरपतवार इसी फफूँद को पालते रहते हैं।
गहरी जुताई: कटाई के बाद गहरी जुताई से बचे अवशेष और बीजाणु मिट्टी में दबकर नष्ट हो जाते हैं।
नाइट्रोजन ज़रूरत से ज़्यादा न दें: ज़्यादा यूरिया से पत्तियाँ मुलायम और घनी होती हैं, खेत में नमी टिकती है और रोग तेज़ी से फैलता है।
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बीज उपचार और छिड़काव — कौन सी दवा, कितनी
सबसे सस्ता बचाव बुवाई के दिन होता है। बीज उपचार शुरुआती संक्रमण को रोक देता है, और छिड़काव उसके बाद की सुरक्षा है।
अवस्था
दवा
मात्रा
बुवाई से पहले (बीज उपचार)
मेटालैक्सिल 35% SD
6 ग्राम प्रति किलो बीज
पहला लक्षण दिखते ही
मैंकोजेब 75% WP
2 ग्राम प्रति लीटर पानी (0.2%)
15 दिन बाद दोहराव
मैंकोजेब 75% WP
2 ग्राम प्रति लीटर पानी
तेज़ प्रकोप / स्टैगहेड दिखने पर
मेटालैक्सिल + मैंकोजेब (संयुक्त)
2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी
छिड़काव करते समय घोल पत्ती की निचली सतह तक पहुँचना चाहिए, क्योंकि फफोले वहीं बनते हैं। नोज़ल को ऊपर की ओर करके, धीरे चलते हुए छिड़किए और घोल में चिपकने वाला पदार्थ (स्टिकर) मिला लीजिए — सरसों की पत्ती पर पानी टिकता नहीं।
⚠️
ये सामान्य सिफारिशें हैं; राज्यवार पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज़ में दवा और मात्रा अलग हो सकती है। खरीदने से पहले डिब्बे का CIB&RC लेबल पढ़िए और नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से पुष्टि कीजिए। किस्म का चुनाव भी राज्य के कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश से ही कीजिए — रोग-सह किस्में क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग हैं।
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किस्म और बीज — सबसे सस्ता बीमा
रोग-सह किस्म चुनिए: जिन खेतों में हर साल सफेद रतुआ आता है, वहाँ किस्म बदलना अकेला सबसे बड़ा फैसला है। अपने ज़िले के कृषि विज्ञान केंद्र से इस साल की सिफारिश की गई सहनशील किस्म पूछिए — यह सूची हर कुछ साल में बदलती है।
प्रमाणित बीज ही लीजिए: घर का रखा बीज पिछले साल के रोग को साथ ले आता है। प्रमाणित बीज पर पहले से उपचार हो सकता है — थैले पर लिखा पढ़ लीजिए।
बीज उपचार का क्रम: पहले फफूँदनाशक, फिर कीटनाशक, आखिर में जैविक कल्चर — पूरा तरीका बीज उपचार विधि में है।
गंधक न भूलिए: सरसों गंधक-प्रेमी फसल है और गंधक की कमी में पौधा हर रोग के आगे कमज़ोर पड़ता है। गंधक की कमी वाला लेख इसकी पहचान बताता है।
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ये गलतियाँ कभी न करें
सफेद रतुआ को तना गलन समझकर कार्बेन्डाजिम डालना — गलत रोग की गलत दवा, पैसा और समय दोनों बर्बाद।
सिर्फ़ पत्ती की ऊपरी सतह पर छिड़काव — फफोले नीचे की सतह पर हैं; घोल वहाँ पहुँचना चाहिए।
विकृत गुच्छे खेत में ही छोड़ देना — वही अगले साल के संक्रमण का भंडार है।
देर से बुवाई करके दवा पर भरोसा करना — देर से बोई फसल में रोग हमेशा भारी पड़ता है, दवा उसकी भरपाई नहीं करती।
हर साल उसी खेत में सरसों लेना — फफूँद खेत में बनी रहती है और हर साल पहले दिन से हमला करती है।
ज़्यादा यूरिया डालना — घनी मुलायम पत्तियाँ नमी रोकती हैं और रोग को न्योता देती हैं।
स्टिकर के बिना छिड़काव — सरसों की चिकनी पत्ती से घोल फिसल जाता है और आधी दवा ज़मीन पर गिरती है।
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कब क्या करें
समय
ज़रूरी काम
सितंबर के आखिर
रोग-सह किस्म और प्रमाणित बीज का इंतज़ाम
बुवाई से 1 दिन पहले
मेटालैक्सिल 35% SD, 6 ग्राम प्रति किलो बीज
अक्टूबर का पहला पखवाड़ा
समय से बुवाई — देर करने पर रोग बढ़ता है
40–45 दिन (दिसंबर)
पत्ती पलटकर निचली सतह की जाँच शुरू
पहला फफोला दिखते ही
मैंकोजेब 2 ग्राम/लीटर, स्टिकर के साथ
15 दिन बाद
दूसरा छिड़काव; धुंध वाले हफ्ते में ज़रूर
फूल की अवस्था
विकृत गुच्छे तोड़कर खेत से बाहर नष्ट करें
कटाई के बाद
अवशेष हटाएँ, गहरी जुताई; अगले साल फसल बदलें
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निष्कर्ष
तीन बातें याद रखिए। पहली — पहचान पत्ती की निचली सतह पर होती है, ऊपर से देखकर नहीं। दूसरी — असली नुकसान फूल की मुड़ी डंडी से होता है, और वह डंडी एक भी दाना नहीं देती। तीसरी — समय से बुवाई, बीज उपचार और विकृत गुच्छे नष्ट करना — तीनों मिलकर दवा से ज़्यादा काम करते हैं।
सफेद रतुआ खेत में सोता है और हर दिसंबर जागता है — उसे बुवाई के दिन ही रोक दीजिए।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1सरसों में सफेद रतुआ की दवा कौन सी है?
पहला लक्षण दिखते ही मैंकोजेब 75% WP की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी (0.2%) की दर से छिड़काव कीजिए और 15 दिन बाद दोहराइए; तेज़ प्रकोप में मेटालैक्सिल + मैंकोजेब का संयुक्त फफूँदनाशक 2.5 ग्राम प्रति लीटर उपयोग किया जाता है। बुवाई से पहले बीज को मेटालैक्सिल 35% SD की 6 ग्राम प्रति किलो की दर से उपचारित करना सबसे सस्ता बचाव है।
2सरसों में सफेद रतुआ की पहचान कैसे करें?
पत्ती की निचली सतह पर सफेद, उभरे हुए, चूर्ण वाले फफोले इसकी पक्की पहचान हैं, और उन्हीं फफोलों के ठीक ऊपर पत्ती की ऊपरी सतह पर पीले धब्बे बनते हैं। बाद में फूल की डंडी मोटी होकर मुड़ जाती है और हिरण के सींग जैसा गुच्छा बना देती है, जिसे स्टैगहेड कहते हैं।
3सफेद रतुआ और तना गलन में क्या फर्क है?
सफेद रतुआ पत्ती की निचली सतह पर सफेद फफोले बनाता है, जबकि तना गलन में तने पर रुई जैसी सफेद परत और उसके अंदर काले सरसों जैसे दाने मिलते हैं। दोनों की दवा भी अलग है — सफेद रतुआ में मैंकोजेब या मेटालैक्सिल+मैंकोजेब, और तना गलन में कार्बेन्डाजिम।
4स्टैगहेड यानी विकृत फूल का क्या करें?
दिखते ही उन्हें काटकर खेत से बाहर ले जाकर जला दीजिए। उस डंडी से वैसे भी एक भी दाना नहीं मिलेगा, और उसी विकृत गुच्छे में फफूँद के लाखों बीजाणु बनते हैं जो खेत में गिरकर अगले साल की फसल को संक्रमित करते हैं।
5सफेद रतुआ किस मौसम में ज़्यादा लगता है?
ठंडी, नम और ओस वाली रातों में, जब तापमान 15–20°C के आसपास रहता है — यानी दिसंबर-जनवरी की धुंध वाली अवधि में। लगातार कई दिन की धुंध या बेमौसम बारिश के बाद रोग सबसे तेज़ी से बढ़ता है, इसलिए ऐसे हफ्ते में खेत की जाँच बढ़ा दीजिए।
6क्या देर से बुवाई करने पर सफेद रतुआ ज़्यादा लगता है?
हाँ — देर से बोई सरसों में रोग की गंभीरता लगातार बढ़ती जाती है। देर से बोई फसल का नाज़ुक फूल-फली वाला समय उन्हीं ठंडी-नम रातों पर पड़ता है जो फफूँद के लिए सबसे अनुकूल हैं, जबकि अक्टूबर के पहले पखवाड़े की बुवाई में यह अवस्था अपेक्षाकृत सुरक्षित निकल जाती है।
7सफेद रतुआ से बचने के लिए बीज उपचार कैसे करें?
बुवाई से एक दिन पहले मेटालैक्सिल 35% SD की 6 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से बीज पर अच्छी तरह मिलाइए। क्रम याद रखिए — पहले फफूँदनाशक, फिर कीटनाशक और सबसे आखिर में जैविक कल्चर, वरना रासायनिक दवा कल्चर के जीवाणु मार देती है।
8क्या सफेद रतुआ से पूरी फसल खराब हो सकती है?
पूरी फसल आम तौर पर नहीं मरती, लेकिन जितनी फूल-डंडियाँ स्टैगहेड बन जाती हैं, उनकी उपज पूरी तरह शून्य हो जाती है। इसीलिए नुकसान का असली पैमाना पत्ती के फफोले नहीं, विकृत गुच्छों की गिनती है — और वही रोका जा सकता है, अगर बीज उपचार और समय पर छिड़काव हो।
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