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🌾 अलसी 🗓️ अक्टूबर–नवंबर 🪰 कली मक्खी

अलसी की खेती Linseed (Flaxseed) Cultivation

धान के बाद बची नमी पर उठ जाने वाली फसल, जिसकी बुवाई का खर्च लगभग शून्य है — और जिसका सबसे बड़ा नुक़सान बाहर से दिखता ही नहीं।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 10 मिनट पढ़ें 📅 सितंबर 2026

खाली खेत को कमाऊ बनाने वाली फसल

🌱
25–30 किलो
बीज प्रति हेक्टेयर
💧
0–2
सिंचाई पूरी फसल में
🗓️
120–130 दिन
पकने में समय
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भूमिका

धान काटने के बाद जो खेत खाली पड़ा रहता है — न पूरी नमी बची, न नहर की बारी पक्की — वहाँ की सबसे पुरानी और सबसे कम पूछी जाने वाली फसल अलसी है। मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा अलसी उत्पादक राज्य है, और यहाँ का बड़ा हिस्सा अलसी को उतेरा तरीक़े से बोता है, यानी खड़ी धान की फसल में ही बीज छिटककर।

अलसी को लेकर दो बातें साफ़ समझ लेनी चाहिए। पहली — इस फसल का कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नहीं है, सरकार की 22 फसलों की सूची में अलसी शामिल नहीं है, इसलिए भाव पूरी तरह बाज़ार तय करता है। दूसरी — इसकी असली दुश्मन कली मक्खी (बड फ्लाई) है, जो फूल के भीतर बैठकर दाना बनने ही नहीं देती, और खेत बाहर से हरा-भरा दिखता रहता है। यह लेख बुवाई से बिक्री तक का पूरा हिसाब देता है।


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⚖️

अलसी किस खेत की फसल है

अलसी को उन खेतों में मत तौलिए जहाँ पानी और खाद पूरी मिलती है — वहाँ गेहूं ज़्यादा देगा। अलसी की जगह वहाँ है जहाँ धान के बाद बची हुई नमी ही एकमात्र पूँजी है

बातगेहूंअलसी
सिंचाई की ज़रूरत5–60–2 (बची नमी पर भी चल जाती है)
पकने में समयलगभग 135–145 दिनलगभग 120–130 दिन
खाद का खर्चऊँचाकम
MSPहै (रबी विपणन वर्ष के अनुसार)नहीं है — भाव बाज़ार तय करता है
दो कमाइयाँदाना और भूसातेल का दाना और रेशा (फाइबर)
सबसे बड़ा जोखिमपछेती गर्मीकली मक्खी और उकठा
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अलसी को "गरीब खेत की फसल" कहकर छोड़ देना ही इसकी सबसे बड़ी उपेक्षा है। सच यह है कि जिस खेत में गेहूं आधा उतरता है, वहाँ अलसी लगभग पूरी उतरती है — और लागत का अंतर इतना बड़ा है कि प्रति एकड़ शुद्ध बचत बराबरी पर आ जाती है।

🌱

बुवाई — समय, बीज दर और उतेरा

अलसी की बुवाई के लिए अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। किसी कारण से देर हो जाए तो नवंबर के अंत तक भी बोई जा सकती है, पर तब उपज घटती है।

तरीक़ाबुवाई का समयबीज दर प्रति हेक्टेयरकतार की दूरी
कतार में, अकेली फसलअक्टूबर मध्य – नवंबर मध्य25–30 किलो30 सेंटीमीटर
उतेरा (खड़ी धान में छिटकवाँ)धान की कटाई से 10–15 दिन पहले35–40 किलोछिटकवाँ
मिश्रित खेती (चना/मसूर के साथ)अक्टूबर–नवंबर8–10 किलोफसल के अनुसार

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खाद और पानी — कम में काम चलाने की फसल

⚠️
खाद की मात्रा राज्य, मिट्टी और किस्म के हिसाब से बदलती है। बोरी उठाने से पहले मिट्टी जाँच रिपोर्ट देखिए और अपने कृषि विज्ञान केंद्र या ज़िले के कृषि विभाग से पुष्टि कर लीजिए। मुफ़्त जाँच की प्रक्रिया मिट्टी जाँच व सॉइल हेल्थ कार्ड में समझाई गई है।

🐛

कली मक्खी — वह नुक़सान जो दिखता नहीं

अलसी में सबसे बड़ा नुक़सान कली मक्खी (बड फ्लाई) करती है। यह मक्खी फूल की बंद कली में अंडा देती है, और उसका सूँडी रूप भीतर ही अंडाशय खा जाता है। बाहर से कली सामान्य दिखती है, फूल भी खिल जाता है — पर उसमें कैप्सूल (डोडा) बनता ही नहीं।

पहचान बिंदु✅ स्वस्थ फसल❌ ग्रस्त फसल
फूल के बादहर फूल की जगह गोल डोडा बनता हैकई जगह फूल झड़ जाता है, डोडा बनता ही नहीं
कली खोलकर देखने परभीतर सामान्य अंडाशयभीतर छोटी सफ़ेद-नारंगी सूँडी
पौधे की शक्लडोडों से लदी शाखाएँहरी-भरी शाखा, पर लगभग खाली
उपजपूरीभारी गिरावट, बिना किसी दिखने वाले रोग के

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ये गलतियाँ कभी न करें


🚜

कटाई, रेशा और बिक्री

फसल लगभग 120–130 दिन में पक जाती है। कटाई तब कीजिए जब डोडे भूरे पड़ जाएँ और तना पीला होने लगे — पूरी तरह सूखने का इंतज़ार करने पर डोडे चटककर बीज खेत में गिरा देते हैं।


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कब क्या करें

समयज़रूरी काम
अक्टूबर की शुरुआतकिस्म और बीज का इंतज़ाम; उतेरा वाले खेत में नमी की जाँच
अक्टूबर मध्यबीज उपचार; उतेरा के लिए खड़ी धान में बीज छिटकना
अक्टूबर मध्य – नवंबर मध्यकतार में बुवाई; पूरी फॉस्फोरस व गंधक, आधी नाइट्रोजन
दिसंबर की शुरुआतनिराई-गुड़ाई; सिंचित खेत में पहली सिंचाई और बाक़ी नाइट्रोजन
दिसंबर के आख़िरकली बनना शुरू — हफ़्ते में दो बार कलियाँ खोलकर मक्खी की जाँच
जनवरीफूल की अवस्था — ज़रूरत हो तो कली मक्खी का छिड़काव; पाले पर नज़र
फरवरीडोडा भरना; दूसरी हल्की सिंचाई अगर उपलब्ध हो
फरवरी–मार्चडोडे भूरे पड़ते ही कटाई; सुखाई और भाव की तुलना

निष्कर्ष

तीन बातें याद रखिए। पहली — अलसी उस खेत की फसल है जहाँ गेहूं आधा उतरता है, और उतेरा तरीक़े में तो बुवाई का खर्च लगभग शून्य है। दूसरी — कली मक्खी का नुक़सान बाहर से दिखता नहीं, इसलिए कली अवस्था में कली खोलकर देखना ही एकमात्र भरोसेमंद निगरानी है। तीसरी — अलसी MSP सूची में नहीं है, इसलिए भाव की योजना ख़ुद बनानी पड़ती है; इसे सरकारी खरीद के भरोसे मत छोड़िए।

अलसी बड़ी उपज नहीं देती — यह कम लागत में एक खाली खेत को कमाऊ बना देती है, और यही इसका पूरा गणित है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1अलसी की बुवाई का सही समय क्या है?
अलसी की बुवाई के लिए अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक का समय सबसे उपयुक्त है, और किसी कारण से देर हो जाए तो नवंबर के अंत तक भी बोई जा सकती है — पर तब उपज घटती है। समय पर बुवाई का एक और बड़ा फ़ायदा है: देर से बोई फसल का फूल उस समय आता है जब कली मक्खी की संख्या चरम पर होती है, और समय पर बुवाई यह भिड़ंत टाल देती है।
2अलसी में बीज दर प्रति हेक्टेयर कितनी रखें?
कतार में बोई जाने वाली अकेली फसल के लिए 25–30 किलो प्रति हेक्टेयर बीज लगता है, उतेरा (खड़ी धान में छिटकवाँ) में इसे बढ़ाकर लगभग 35–40 किलो रखा जाता है, और चना या मसूर के साथ मिश्रित खेती में सिर्फ़ 8–10 किलो। कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और बीज की गहराई 3–4 सेंटीमीटर रखिए।
3उतेरा (पैरा) खेती में अलसी कब छिटकें?
उतेरा में बीज धान की कटाई से 10–15 दिन पहले छिटका जाता है, जब खेत में नमी बची हो पर पानी खड़ा न हो। बहुत जल्दी छिटकने पर बीज सड़ जाता है और बहुत देर करने पर नमी नहीं मिलती और जमाव ही नहीं होता। इस तरीक़े में जुताई और बुवाई का खर्च लगभग शून्य रहता है, जो अलसी की सबसे बड़ी ख़ूबी है।
4क्या अलसी पर MSP मिलता है?
नहीं — अलसी सरकार की उन 22 फसलों की सूची में नहीं है जिन पर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होता है, इसलिए इसका भाव पूरी तरह खुला बाज़ार तय करता है। तिलहनों में MSP मूँगफली, सरसों, सोयाबीन, तिल, सूरजमुखी, कुसुम और रामतिल पर है, अलसी पर नहीं। इसका सीधा मतलब यह है कि बेचने की योजना ख़ुद बनानी पड़ती है और मंडी-दर-मंडी भाव मिलाकर देखना ज़रूरी है।
5अलसी में कली मक्खी (बड फ्लाई) से कैसे बचें?
सबसे बड़ा बचाव समय पर बुवाई है, और उसके बाद कली अवस्था में ही छिड़काव — डोडा बन जाने के बाद कोई दवा काम नहीं करती क्योंकि सूँडी भीतर सुरक्षित हो चुकी होती है। यह मक्खी फूल की बंद कली में अंडा देती है और सूँडी भीतर ही अंडाशय खा जाती है, इसलिए खेत बाहर से हरा-भरा दिखता है पर डोडे बनते ही नहीं। कली बनना शुरू होते ही हफ़्ते में दो बार कुछ कलियाँ खोलकर जाँचिए।
6अलसी की उपज कितनी होती है?
असिंचित दशा में अलसी की उपज सामान्यतः लगभग 675 किलो प्रति हेक्टेयर के आसपास रहती है, और सिंचाई तथा सही प्रबंधन मिलने पर इससे काफ़ी बेहतर हो जाती है। फसल लगभग 120–130 दिन में पक जाती है। उपज गेहूं जितनी नहीं है, पर लागत का अंतर बड़ा है — इसलिए तुलना क्विंटल में नहीं, प्रति एकड़ शुद्ध बचत में कीजिए।
7अलसी में कितनी सिंचाई चाहिए?
अलसी बची हुई नमी पर भी चल जाती है, पर सिंचाई उपलब्ध हो तो दो पानी दीजिए — पहला फूल आने से ठीक पहले (लगभग 45–50 दिन) और दूसरा दाना भरते समय (लगभग 70–75 दिन)। अगर सिर्फ़ एक ही सिंचाई मिल सके तो फूल वाली कीजिए। भारी सिंचाई से बचिए — अलसी जल-भराव बिल्कुल नहीं सहती और उकठा (विल्ट) का ख़तरा सीधे बढ़ जाता है।
8मध्य प्रदेश में अलसी की कौन सी किस्म लगाएँ?
मध्य प्रदेश में जवाहर श्रेणी की किस्में — जैसे जवाहर-7, जवाहर-17 और जवाहर-552 — प्रचलित हैं, और महाकोशल तथा आसपास के इलाक़ों में नंबर-55 भी लगाई जाती है। किस्म चुनते समय सबसे ज़रूरी बात उकठा-रोधी होना है, क्योंकि उकठा अलसी का सबसे नुक़सानदेह रोग है और लग जाने के बाद दवा से बहुत कम फ़र्क़ पड़ता है। इस साल की सिफारिश अपने ज़िले के कृषि विज्ञान केंद्र से पूछकर ही बीज लीजिए।
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