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🌾 जौ 🗓️ 25 अक्टूबर–25 नवंबर 💧 कम पानी

जौ की खेती Barley Cultivation

दो सिंचाई, आधी नाइट्रोजन और रेह वाली ज़मीन में भी टिकने वाली फसल — और माल्ट उद्योग का एक अलग बाज़ार।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 9 मिनट पढ़ें 📅 सितंबर 2026

जहाँ गेहूं हर साल निराश करता है, वहाँ की फसल

💧
2 सिंचाई
पूरी फसल के लिए
🌱
40 किलो
बीज प्रति एकड़
🗓️
120–130 दिन
पकने में समय
📖

भूमिका

जिस खेत में नहर की बारी दो बार से ज़्यादा नहीं आती, या जहाँ की ज़मीन में सफेद रेह उभर आती है, वहाँ गेहूं हर साल किसान को निराश करता है। ऐसे खेतों की असली फसल जौ है — रबी की वह फसल जो सिर्फ़ दो सिंचाई में तैयार हो जाती है, गेहूं से कम खाद माँगती है, जल्दी पक जाती है और लवणीय-क्षारीय ज़मीन भी सह लेती है

जौ की एक और बात कम लोग जानते हैं: इसके दो अलग बाज़ार हैं। एक साधारण दाना और पशु चारे का, और दूसरा माल्ट उद्योग का, जहाँ कंपनियाँ अनुबंध पर खरीदती हैं और भाव बेहतर मिलता है। पर माल्ट वाली जौ की खेती का तरीका अलग है — उसमें नाइट्रोजन जानबूझकर कम रखनी पड़ती है, वरना दाना अस्वीकार हो जाता है। यह लेख दोनों रास्तों का पूरा कार्यक्रम देता है।


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⚖️

जौ या गेहूं — किस खेत में क्या

बातगेहूंजौ
सिंचाई की ज़रूरत5–62 (एक भी चल जाती है)
नाइट्रोजन की माँगज़्यादालगभग आधी
पकने में समयलगभग 135–145 दिनलगभग 120–130 दिन
लवणीय-क्षारीय ज़मीनकमज़ोरकाफ़ी सहनशील
बाज़ार भावआम तौर पर ऊँचाआम तौर पर कम
अतिरिक्त फायदाभूसा पशु चारे के लिए बेहतर; माल्ट का अलग बाज़ार
💡
फैसले का नियम सीधा है — जहाँ पानी और खाद पूरी मिल सकती है वहाँ गेहूं, और जहाँ दोनों सीमित हैं या ज़मीन में रेह है वहाँ जौ। जौ की उपज गेहूं जितनी बड़ी नहीं होती, पर वह कम लागत में मिलती है — और यही उन खेतों में मुनाफ़े का असली रास्ता है।

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बुवाई — समय, बीज दर और दूरी

दशाबुवाई का समयबीज दर प्रति एकड़कतार की दूरी
सिंचित, समय से25 अक्टूबर – 25 नवंबरलगभग 40 किलो22–23 सेंटीमीटर
बारानी (असिंचित)अक्टूबर के मध्य में, नमी देखकर45–50 किलो22–23 सेंटीमीटर
पछेतीदिसंबर50 किलो18–20 सेंटीमीटर

🧪

खाद — गेहूं से आधी नाइट्रोजन

सिंचित, समय से बोई जौ के लिए सामान्य सिफारिश 60:30:20 किलो NPK प्रति हेक्टेयर है — यानी गेहूं की आधी नाइट्रोजन। एक एकड़ में बदलकर यह इतना बनता है:

⚠️
माल्ट के लिए जौ बो रहे हैं तो नाइट्रोजन बढ़ाइए मत — घटाइए। माल्ट उद्योग को कम प्रोटीन वाला, मोटा और एक जैसा दाना चाहिए, और ज़्यादा नाइट्रोजन सीधे प्रोटीन बढ़ा देती है। ऐसी उपज माल्ट कंपनी अस्वीकार कर सकती है और वह फिर साधारण दाने के भाव में बिकती है। अनुबंध खेती कर रहे हैं तो खाद की मात्रा कंपनी के सलाहकार से लिखवा लीजिए। ये सामान्य सिफारिशें हैं — अपने राज्य की सिफारिश और मिट्टी जाँच रिपोर्ट के हिसाब से कृषि विज्ञान केंद्र से पुष्टि कर लीजिए।

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सिंचाई — सिर्फ़ दो, पर दोनों तय दिनों पर

जौ की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि पूरी फसल दो सिंचाई में निकल जाती है। पर वे दो सिंचाई कब हों, यह तय है।

सिंचाईबुवाई के बाद दिनअवस्था
पहली30–35 दिनताजमूल जड़ें बनना — सबसे ज़रूरी
दूसरी65–70 दिनबाली निकलने से ठीक पहले

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रोग और कीट — जौ में क्या देखना है


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कटाई, उपज और बिक्री


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ये गलतियाँ कभी न करें


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जौ का पूरा कैलेंडर

समयज़रूरी काम
अक्टूबर की शुरुआतकिस्म तय कीजिए — दाने वाली या माल्ट वाली; बीज का इंतज़ाम
बुवाई से 1 दिन पहलेबीज उपचार — कंडवा के लिए फफूँदनाशक, ज़रूरत हो तो दीमक की दवा
25 अक्टूबर – 25 नवंबरबुवाई; बुवाई के दिन DAP, पोटाश और आधी यूरिया कूँड़ में
30–35 दिनपहली सिंचाई — उससे ठीक पहले बाकी यूरिया
35–40 दिनखरपतवार नियंत्रण
65–70 दिनदूसरी सिंचाई (बाली निकलने से पहले)
बाली की अवस्थारतुआ और माहू की निगरानी; कंडवा वाली बालियाँ ढककर हटाएँ
120–130 दिनकटाई; माल्ट वाली उपज अलग रखें और नमी सुखाकर बेचें

निष्कर्ष

तीन बातें याद रखिए। पहली — जौ उस खेत की फसल है जहाँ पानी सीमित है या ज़मीन में रेह है; वहाँ यह गेहूं से बेहतर कमाई देती है। दूसरी — दो सिंचाई काफी हैं, पर पहली 30–35 दिन पर होनी ही चाहिए। तीसरी — माल्ट के लिए बो रहे हैं तो नाइट्रोजन घटाइए, बढ़ाइए मत

जौ कम माँगती है और कम में देती है — इसी में उसका पूरा गणित छिपा है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1जौ की बुवाई कब और कितने बीज से करें?
सिंचित और समय से बुवाई के लिए 25 अक्टूबर से 25 नवंबर के बीच, लगभग 40 किलो बीज प्रति एकड़ और कतार से कतार 22–23 सेंटीमीटर की दूरी रखिए। बारानी खेत में बुवाई अक्टूबर के मध्य में नमी देखकर और बीज 45–50 किलो, तथा दिसंबर की पछेती बुवाई में बीज बढ़ाकर लगभग 50 किलो प्रति एकड़ कर दीजिए।
2जौ में कितनी सिंचाई चाहिए?
सिर्फ़ दो — पहली बुवाई के 30–35 दिन बाद और दूसरी 65–70 दिन पर, बाली निकलने से ठीक पहले। अगर सिर्फ़ एक सिंचाई संभव हो तो वह 30–35 दिन वाली ही होनी चाहिए; और सिंचाई हमेशा हल्की कीजिए, क्योंकि जौ खेत में पानी भरा रहना बर्दाश्त नहीं करती।
3जौ में कितनी खाद डालनी चाहिए?
सिंचित जौ के लिए सामान्य सिफारिश 60:30:20 किलो NPK प्रति हेक्टेयर है, यानी प्रति एकड़ लगभग आधी बोरी DAP, 13 किलो पोटाश और कुल 42 किलो यूरिया — आधी यूरिया बुवाई पर और आधी पहली सिंचाई पर। बारानी खेत में मात्रा लगभग आधी कर दीजिए और पूरी खाद बुवाई के समय नमी में ही डालिए।
4जौ गेहूं से बेहतर कब है?
जहाँ सिंचाई दो बार से ज़्यादा संभव नहीं, खाद सीमित है, या ज़मीन लवणीय-क्षारीय है — वहाँ जौ गेहूं से बेहतर पड़ती है। इसकी उपज गेहूं जितनी बड़ी नहीं होती और भाव भी आम तौर पर कम रहता है, पर लागत काफ़ी कम होने से ऐसे खेतों में शुद्ध मुनाफ़ा ज़्यादा बैठता है।
5माल्ट वाली जौ की खेती में क्या अलग करना पड़ता है?
सबसे बड़ा फर्क यह है कि नाइट्रोजन कम रखनी पड़ती है, क्योंकि माल्ट उद्योग को कम प्रोटीन वाला, मोटा और एक जैसा दाना चाहिए और ज़्यादा यूरिया सीधे प्रोटीन बढ़ा देती है। साथ ही माल्ट किस्म का बीज अलग होता है, और मड़ाई-भंडारण अलग रखना पड़ता है — मिलावट होने पर पूरा लॉट साधारण भाव में चला जाता है।
6जौ में कंडवा रोग का इलाज क्या है?
कंडवा बीज से आता है, इसलिए इसका एकमात्र इलाज बुवाई से पहले बीज उपचार है — खड़ी फसल में इसका कोई इलाज नहीं। खेत में काली बाली दिखे तो उसे कागज़ की थैली से ढककर काटिए और खेत से बाहर जलाइए, ताकि काला चूर्ण दूसरी बालियों तक न उड़े।
7जौ कितने दिन में पक जाती है?
लगभग 120–130 दिन में — यानी गेहूं से पहले। बालियाँ झुक जाएँ और दाना दाँत से काटने पर सख्त लगे, तब कटाई कर लीजिए; ज़्यादा पकने पर जौ की बालियाँ टूटकर गिरने लगती हैं और खेत में ही नुकसान हो जाता है।
8जौ का भूसा किस काम आता है?
जौ का भूसा पशुओं के लिए अच्छा चारा माना जाता है और उसकी अपनी माँग रहती है, इसलिए दुधारू पशु रखने वाले किसान के लिए यह छिपी हुई आमदनी है। यही एक और वजह है कि सीमित पानी वाले पशुपालक किसान के लिए जौ का गणित गेहूं से बेहतर बैठता है।
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