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भूमिका
महाराष्ट्र के काली मिट्टी वाले इलाक़ों में — सोलापुर, अहिल्यानगर, पुणे, सांगली, धाराशिव, लातूर — मानसून लौटते ही एक फसल बोई जाती है जिसे स्थानीय भाषा में शालू कहते हैं। यह रबी की ज्वार है, और यह खरीफ की ज्वार से लगभग हर मामले में अलग फसल है: अलग किस्में, अलग बुवाई का समय, और सबसे बड़ी बात — यह बारिश पर नहीं, मिट्टी में बची हुई नमी पर खड़ी होती है।
इसी वजह से रबी ज्वार में सबसे बड़ी भूल बुवाई में देरी है। हर बीता हुआ हफ़्ता मिट्टी की नमी नीचे खींच ले जाता है, और जिस दिन बोया गया उसी दिन से उपज की सीमा तय हो जाती है। महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ की सिफारिश साफ़ है — 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच बुवाई। यह लेख किस्म के चुनाव से लेकर कड़बा और हुरड़ा की कमाई तक का पूरा हिसाब देता है।
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खरीफ ज्वार और रबी ज्वार — एक ही फसल नहीं
कई किसान खरीफ की ज्वार का बीज रबी में बो देते हैं और फिर उपज न आने की शिकायत करते हैं। दोनों की माँग बिल्कुल अलग है।
| बात | खरीफ ज्वार | रबी ज्वार (शालू) |
| पानी कहाँ से | बारिश से | मिट्टी में बची नमी से |
| बुवाई | जून–जुलाई | 15 सितंबर – 15 अक्टूबर |
| किस्में | खरीफ की अलग किस्में | मालदांडी 35-1, फुले वसुधा, फुले सुचित्रा आदि |
| दाने का रंग | अक्सर हल्का पड़ जाता है | मोती जैसा सफ़ेद — भाकरी के लिए सबसे अच्छा |
| कड़बा (चारा) | कम गुणवत्ता | बहुत बढ़िया, बड़ी कमाई |
| सबसे बड़ा जोखिम | बारिश का टूटना | देर से बुवाई और नमी का खिसकना |
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रबी ज्वार का दाना अपनी सफ़ेदी और भाकरी की गुणवत्ता के लिए जाना जाता है — और मंडी में यही सफ़ेदी भाव तय करती है। खरीफ का दाना उसी भाव में नहीं जाता, इसलिए रबी की सही किस्म लगाना सीधा भाव का सवाल है।
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किस्म का चुनाव — मिट्टी की गहराई से तय होता है
रबी ज्वार में किस्म का चुनाव सुनी-सुनाई बात से नहीं, अपने खेत की मिट्टी की गहराई से करना चाहिए। जितनी गहरी काली मिट्टी, उतनी ज़्यादा नमी वह पकड़कर रखती है, और उतनी लंबी अवधि की किस्म चल सकती है।
| मिट्टी की गहराई | प्रचलित सिफारिश की गई किस्में |
| मध्यम (लगभग 60 सेंटीमीटर तक) | फुले सुचित्रा, फुले माउली, फुले चित्रा, परभणी मोती, मालदांडी 35-1 |
| भारी / गहरी (60 सेंटीमीटर से ज़्यादा) | फुले वसुधा, फुले यशोदा, CSV-22 |
- फुले वसुधा: लगभग 118–122 दिन में पकती है और पानी की कमी, तना छेदक तथा एर्गट (चिकटा) रोग तीनों के प्रति सहनशील मानी जाती है — गहरी मिट्टी वालों के लिए यह भरोसेमंद विकल्प है।
- मालदांडी 35-1: बहुत पुरानी और आज भी चलती किस्म, दाने की गुणवत्ता और कड़बे दोनों के लिए जानी जाती है।
- उथली मिट्टी में लंबी अवधि की किस्म मत लगाइए: पौधा दाना भरने से पहले ही नमी खो देगा, और खेत पीला पड़ जाएगा।
- बीज हर साल नया मत खरीदिए, पर हर तीसरे साल बदलिए: अपनी ही उपज से लगातार बीज रखने पर किस्म की शुद्धता और उपज दोनों गिरती हैं।
- इस साल की सिफारिश ज़रूर पूछिए: कृषि विद्यापीठ हर कुछ साल में नई किस्में जोड़ता है — अपने ज़िले के कृषि विज्ञान केंद्र से इस साल की सूची लेकर ही बीज तय कीजिए।
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बुवाई — समय, बीज दर और दूरी
| बात | सिफारिश |
| बुवाई का समय | 15 सितंबर – 15 अक्टूबर |
| बीज दर (दाने के लिए) | 8–10 किलो प्रति हेक्टेयर (लगभग 3 किलो प्रति एकड़) |
| बीज दर (चारे के लिए) | लगभग 40 किलो प्रति हेक्टेयर |
| कतार से कतार | 45 सेंटीमीटर |
| पौधे से पौधा | 15 सेंटीमीटर (विरलीकरण के बाद) |
| पौधों की संख्या — बारानी | लगभग 1.35 लाख प्रति हेक्टेयर |
| पौधों की संख्या — सिंचित | 1.5–1.8 लाख प्रति हेक्टेयर |
| बीज उपचार | एज़ोटोबैक्टर 250 ग्राम प्रति 10 किलो बीज |
- बीज को नमी तक पहुँचाइए: बुवाई की गहराई ऐसी रखिए कि बीज नम परत में बैठे, सूखी ऊपरी परत में नहीं। रबी ज्वार में जमाव की लगभग हर शिकायत की जड़ यही है।
- विरलीकरण मत टालिए: अंकुरण के 10–15 दिन बाद अतिरिक्त पौधे निकालकर 15 सेंटीमीटर की दूरी बना दीजिए। भीड़ में हर पौधा नमी के लिए लड़ता है और किसी का भी दाना पूरा नहीं भरता।
- देरी का सीधा हिसाब: अक्टूबर के मध्य के बाद बोया गया हर हफ़्ता उपज घटाता है, क्योंकि तब तक नमी नीचे खिसक चुकी होती है — और रबी ज्वार के पास उसे भरने के लिए बारिश नहीं है।
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नमी बचाना ही असली सिंचाई है
बारानी रबी ज्वार में पानी देने का विकल्प ही नहीं होता, इसलिए पूरा खेल मानसून की नमी को मिट्टी में रोक लेने का है। ये सब काम बुवाई से पहले या बुवाई के तुरंत बाद के हैं, और इनमें दवा-खाद जैसा कोई खर्च नहीं।
- मानसून के बाद तुरंत खेत बंद कीजिए: बारिश रुकते ही खेत को खुला मत छोड़िए — खुली मिट्टी से नमी सबसे तेज़ी से उड़ती है।
- ढलान के आर-पार बुवाई: कतारें ढलान की दिशा में नहीं, उसके आर-पार डालिए। यह पानी और मिट्टी दोनों को खेत में रोकता है।
- बुवाई के 20–25 दिन बाद डोरा/कोल्पा चलाइए: ऊपरी परत तोड़ने से नीचे की नमी उड़ना कम हो जाता है — यह पुराना और आज़माया हुआ तरीक़ा है।
- खरपतवार जल्दी निकालिए: हर खरपतवार वही नमी पी रहा है जिसके भरोसे आपकी फसल खड़ी है। नियंत्रण के तरीक़े खरपतवारनाशी गाइड में हैं।
- सिंचाई उपलब्ध हो तो तीन पानी: पहला अंकुरण के समय, दूसरा बाली निकलने पर और तीसरा दाना भरते समय — इनमें बाली निकलने वाला पानी सबसे ज़रूरी है।
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खाद — दशा के हिसाब से, एक ही नुस्खा नहीं
| दशा | NPK प्रति हेक्टेयर | कब दें |
| बारानी — उथली से मध्यम मिट्टी | 40 : 20 : 00 | पूरी मात्रा बुवाई के समय |
| बारानी — गहरी मिट्टी | 60 : 30 : 00 | पूरी मात्रा बुवाई के समय |
| सिंचित | 80 : 40 : 40 | आधी नाइट्रोजन बुवाई पर, आधी पहली सिंचाई पर |
बारानी दशा में पूरी खाद बुवाई के समय देने का कारण सीधा है — बाद में डाली गई खाद को घोलने के लिए पानी ही नहीं है, इसलिए वह पौधे तक पहुँचती ही नहीं और बर्बाद जाती है।
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ऊपर की मात्राएँ सामान्य सिफारिश हैं। असली मात्रा आपकी
मिट्टी जाँच रिपोर्ट और स्थानीय कृषि विद्यापीठ की इस साल की सिफारिश से तय होनी चाहिए। बोरी उठाने से पहले अपने
कृषि विज्ञान केंद्र या तालुका कृषि अधिकारी से पुष्टि कर लीजिए। मुफ़्त मिट्टी जाँच की प्रक्रिया
मिट्टी जाँच व सॉइल हेल्थ कार्ड में है।
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तीन कमाइयाँ — दाना, कड़बा और हुरड़ा
रबी ज्वार का पूरा गणित सिर्फ़ दाने पर मत लगाइए। एक ही खेत से तीन तरह की आमदनी निकल सकती है।
- दाना: सफ़ेद, मोती जैसा दाना भाकरी के बाज़ार में जाता है और यही मंडी का मुख्य भाव तय करता है। आज का भाव ज्वार के भाव पेज पर देखा जा सकता है।
- कड़बा: कटाई के बाद बचा सूखा चारा। महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में कड़बे की गाड़ी अलग बिकती है और यह पशुपालकों की बड़ी माँग है। हरे चारे की योजना हरा चारा वाले लेख में है।
- हुरड़ा: दिसंबर-जनवरी में दाना जब दूधिया-मुलायम अवस्था में होता है, तब उसे भूनकर बेचा जाता है। शहर के पास वाले खेतों के लिए यह सबसे ऊँची कीमत वाला रास्ता है — पर ध्यान रहे, हुरड़े के लिए काटी गई बाली से दाना नहीं मिलेगा, इसलिए खेत का एक हिस्सा ही इसके लिए तय कीजिए।
- बेचने से पहले भाव मिलाइए: ज्वार का भाव मंडी-दर-मंडी अलग होता है, और एक दिन की तुलना अक्सर पूरी ढुलाई से ज़्यादा बचा देती है।
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निष्कर्ष
तीन बातें याद रखिए। पहली — 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच बोइए; रबी ज्वार में तारीख़ ही सबसे बड़ा इनपुट है, क्योंकि नमी लौटकर नहीं आती। दूसरी — किस्म मिट्टी की गहराई देखकर चुनिए, उथली मिट्टी में लंबी अवधि की किस्म दाना भरने से पहले ही सूख जाएगी। तीसरी — कड़बे और हुरड़े को हिसाब में जोड़िए; रबी ज्वार का पूरा मुनाफ़ा अकेले दाने में नहीं दिखता।
शालू ज्वार बारिश की फसल नहीं, नमी की फसल है — और नमी बचाने का काम बुवाई से पहले शुरू होता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1रबी ज्वार (शालू) की बुवाई कब करनी चाहिए?
महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ की सिफारिश के अनुसार रबी ज्वार की बुवाई 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच करनी चाहिए। यह फसल बारिश पर नहीं, मिट्टी में बची हुई नमी पर खड़ी होती है, इसलिए हर बीता हुआ हफ़्ता नमी को नीचे खिसका देता है और उपज की सीमा उसी दिन तय हो जाती है जिस दिन बोया गया। अक्टूबर के मध्य के बाद की बुवाई सबसे महँगी भूल है।
2रबी ज्वार में बीज दर कितनी रखें?
दाने के लिए 8–10 किलो प्रति हेक्टेयर यानी लगभग 3 किलो प्रति एकड़ बीज लगता है, जबकि चारे के लिए बोनी हो तो यह बढ़कर लगभग 40 किलो प्रति हेक्टेयर हो जाता है। कतार से कतार की दूरी 45 सेंटीमीटर और विरलीकरण के बाद पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर रखिए। बुवाई से पहले एज़ोटोबैक्टर 250 ग्राम प्रति 10 किलो बीज की दर से उपचार कीजिए।
3रबी ज्वार की कौन सी किस्म लगाएँ?
किस्म का चुनाव खेत की मिट्टी की गहराई से कीजिए — मध्यम गहराई (लगभग 60 सेंटीमीटर तक) वाली मिट्टी के लिए फुले सुचित्रा, फुले माउली, फुले चित्रा, परभणी मोती और मालदांडी 35-1, तथा भारी या गहरी मिट्टी (60 सेंटीमीटर से ज़्यादा) के लिए फुले वसुधा, फुले यशोदा और CSV-22 प्रचलित सिफारिशें हैं। उथली मिट्टी में लंबी अवधि की किस्म लगाने पर पौधा दाना भरने से पहले ही नमी खो देता है।
4फुले वसुधा किस्म की क्या ख़ासियत है?
फुले वसुधा लगभग 118–122 दिन में पकती है और पानी की कमी, तना छेदक तथा एर्गट (चिकटा) रोग — तीनों के प्रति सहनशील मानी जाती है। यह गहरी काली मिट्टी वाले खेतों के लिए सिफारिश की जाती है, जहाँ मिट्टी लंबी अवधि तक नमी पकड़कर रख सकती है। उथली मिट्टी में यह किस्म अपनी पूरी क्षमता नहीं दिखा पाती।
5रबी ज्वार में खाद कितनी डालें?
दशा के हिसाब से अलग — बारानी उथली से मध्यम मिट्टी में 40:20:00, बारानी गहरी मिट्टी में 60:30:00 और सिंचित दशा में 80:40:40 किलो NPK प्रति हेक्टेयर। बारानी दशा में पूरी मात्रा बुवाई के समय ही देनी चाहिए, क्योंकि बाद में डाली गई खाद को घोलने के लिए पानी ही नहीं होता और वह बर्बाद जाती है। सिंचित दशा में आधी नाइट्रोजन बुवाई पर और आधी पहली सिंचाई पर दीजिए।
6रबी ज्वार में कितनी सिंचाई चाहिए?
सिंचाई उपलब्ध हो तो तीन पानी दीजिए — पहला अंकुरण के समय, दूसरा बाली निकलने पर और तीसरा दाना भरते समय; ज़रूरत पड़ने पर यह पाँच तक जा सकता है। इनमें बाली निकलने वाला पानी सबसे ज़रूरी है। बारानी खेत में सिंचाई का विकल्प नहीं होता, इसलिए वहाँ पूरा ध्यान नमी बचाने पर रहता है — बुवाई के 20–25 दिन बाद डोरा चलाना और खरपतवार जल्दी निकालना।
7कड़बा और हुरड़ा से कितनी कमाई हो सकती है?
रबी ज्वार से तीन अलग कमाइयाँ निकलती हैं — दाना, कड़बा (सूखा चारा) और हुरड़ा। कड़बा बहुत अच्छा पशु-चारा है और महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में इसकी गाड़ी अलग बिकती है, कई बार दाने के बराबर या उससे ज़्यादा की कमाई देकर। हुरड़ा दिसंबर-जनवरी में दूधिया-मुलायम दाने को भूनकर बेचने का बाज़ार है और शहर के पास वाले खेतों के लिए सबसे ऊँची कीमत देता है — पर हुरड़े के लिए काटी गई बाली से दाना नहीं मिलेगा, इसलिए खेत का एक हिस्सा ही इसके लिए रखिए।
8खरीफ की ज्वार का बीज रबी में बो सकते हैं?
नहीं — खरीफ और रबी की ज्वार अलग किस्मों की फसल है, और खरीफ का बीज रबी में बोने पर दाना हल्का रहता है तथा रंग फीका पड़ जाता है। रबी ज्वार का दाना अपनी मोती जैसी सफ़ेदी और भाकरी की गुणवत्ता के लिए जाना जाता है, और मंडी में भाव उसी सफ़ेदी से तय होता है। इसलिए रबी के लिए मालदांडी 35-1, फुले वसुधा जैसी रबी की सिफारिश की गई किस्में ही लगाइए।