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📍 महाराष्ट्र 🗓️ 15 सितंबर–15 अक्टूबर 💧 बची हुई नमी पर

रबी ज्वार (शालू) की खेती Rabi Sorghum (Shalu Jowar) Cultivation

यह बारिश की फसल नहीं, मिट्टी में बची नमी की फसल है — और इसीलिए बुवाई की तारीख़ ही इसका सबसे बड़ा इनपुट है।

✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra ⏱️ 10 मिनट पढ़ें 📅 सितंबर 2026

तारीख़ ही सबसे बड़ा इनपुट है

🗓️
15 अक्टूबर
बुवाई की आख़िरी तारीख़
🌱
8–10 किलो
बीज प्रति हेक्टेयर
📏
45 × 15
सेंटीमीटर दूरी
📖

भूमिका

महाराष्ट्र के काली मिट्टी वाले इलाक़ों में — सोलापुर, अहिल्यानगर, पुणे, सांगली, धाराशिव, लातूर — मानसून लौटते ही एक फसल बोई जाती है जिसे स्थानीय भाषा में शालू कहते हैं। यह रबी की ज्वार है, और यह खरीफ की ज्वार से लगभग हर मामले में अलग फसल है: अलग किस्में, अलग बुवाई का समय, और सबसे बड़ी बात — यह बारिश पर नहीं, मिट्टी में बची हुई नमी पर खड़ी होती है।

इसी वजह से रबी ज्वार में सबसे बड़ी भूल बुवाई में देरी है। हर बीता हुआ हफ़्ता मिट्टी की नमी नीचे खींच ले जाता है, और जिस दिन बोया गया उसी दिन से उपज की सीमा तय हो जाती है। महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ की सिफारिश साफ़ है — 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच बुवाई। यह लेख किस्म के चुनाव से लेकर कड़बा और हुरड़ा की कमाई तक का पूरा हिसाब देता है।


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⚖️

खरीफ ज्वार और रबी ज्वार — एक ही फसल नहीं

कई किसान खरीफ की ज्वार का बीज रबी में बो देते हैं और फिर उपज न आने की शिकायत करते हैं। दोनों की माँग बिल्कुल अलग है।

बातखरीफ ज्वाररबी ज्वार (शालू)
पानी कहाँ सेबारिश सेमिट्टी में बची नमी से
बुवाईजून–जुलाई15 सितंबर – 15 अक्टूबर
किस्मेंखरीफ की अलग किस्मेंमालदांडी 35-1, फुले वसुधा, फुले सुचित्रा आदि
दाने का रंगअक्सर हल्का पड़ जाता हैमोती जैसा सफ़ेद — भाकरी के लिए सबसे अच्छा
कड़बा (चारा)कम गुणवत्ताबहुत बढ़िया, बड़ी कमाई
सबसे बड़ा जोखिमबारिश का टूटनादेर से बुवाई और नमी का खिसकना
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रबी ज्वार का दाना अपनी सफ़ेदी और भाकरी की गुणवत्ता के लिए जाना जाता है — और मंडी में यही सफ़ेदी भाव तय करती है। खरीफ का दाना उसी भाव में नहीं जाता, इसलिए रबी की सही किस्म लगाना सीधा भाव का सवाल है।

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किस्म का चुनाव — मिट्टी की गहराई से तय होता है

रबी ज्वार में किस्म का चुनाव सुनी-सुनाई बात से नहीं, अपने खेत की मिट्टी की गहराई से करना चाहिए। जितनी गहरी काली मिट्टी, उतनी ज़्यादा नमी वह पकड़कर रखती है, और उतनी लंबी अवधि की किस्म चल सकती है।

मिट्टी की गहराईप्रचलित सिफारिश की गई किस्में
मध्यम (लगभग 60 सेंटीमीटर तक)फुले सुचित्रा, फुले माउली, फुले चित्रा, परभणी मोती, मालदांडी 35-1
भारी / गहरी (60 सेंटीमीटर से ज़्यादा)फुले वसुधा, फुले यशोदा, CSV-22

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बुवाई — समय, बीज दर और दूरी

बातसिफारिश
बुवाई का समय15 सितंबर – 15 अक्टूबर
बीज दर (दाने के लिए)8–10 किलो प्रति हेक्टेयर (लगभग 3 किलो प्रति एकड़)
बीज दर (चारे के लिए)लगभग 40 किलो प्रति हेक्टेयर
कतार से कतार45 सेंटीमीटर
पौधे से पौधा15 सेंटीमीटर (विरलीकरण के बाद)
पौधों की संख्या — बारानीलगभग 1.35 लाख प्रति हेक्टेयर
पौधों की संख्या — सिंचित1.5–1.8 लाख प्रति हेक्टेयर
बीज उपचारएज़ोटोबैक्टर 250 ग्राम प्रति 10 किलो बीज

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नमी बचाना ही असली सिंचाई है

बारानी रबी ज्वार में पानी देने का विकल्प ही नहीं होता, इसलिए पूरा खेल मानसून की नमी को मिट्टी में रोक लेने का है। ये सब काम बुवाई से पहले या बुवाई के तुरंत बाद के हैं, और इनमें दवा-खाद जैसा कोई खर्च नहीं।


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खाद — दशा के हिसाब से, एक ही नुस्खा नहीं

दशाNPK प्रति हेक्टेयरकब दें
बारानी — उथली से मध्यम मिट्टी40 : 20 : 00पूरी मात्रा बुवाई के समय
बारानी — गहरी मिट्टी60 : 30 : 00पूरी मात्रा बुवाई के समय
सिंचित80 : 40 : 40आधी नाइट्रोजन बुवाई पर, आधी पहली सिंचाई पर

बारानी दशा में पूरी खाद बुवाई के समय देने का कारण सीधा है — बाद में डाली गई खाद को घोलने के लिए पानी ही नहीं है, इसलिए वह पौधे तक पहुँचती ही नहीं और बर्बाद जाती है।

⚠️
ऊपर की मात्राएँ सामान्य सिफारिश हैं। असली मात्रा आपकी मिट्टी जाँच रिपोर्ट और स्थानीय कृषि विद्यापीठ की इस साल की सिफारिश से तय होनी चाहिए। बोरी उठाने से पहले अपने कृषि विज्ञान केंद्र या तालुका कृषि अधिकारी से पुष्टि कर लीजिए। मुफ़्त मिट्टी जाँच की प्रक्रिया मिट्टी जाँच व सॉइल हेल्थ कार्ड में है।

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ये गलतियाँ कभी न करें


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तीन कमाइयाँ — दाना, कड़बा और हुरड़ा

रबी ज्वार का पूरा गणित सिर्फ़ दाने पर मत लगाइए। एक ही खेत से तीन तरह की आमदनी निकल सकती है।


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कब क्या करें

समयज़रूरी काम
अगस्त के आख़िरमिट्टी की गहराई देखकर किस्म तय कीजिए, बीज का इंतज़ाम
सितंबर की शुरुआतमानसून हटते ही खेत की तैयारी; नमी रोकने के काम
15 सितंबर – 15 अक्टूबरबुवाई — एज़ोटोबैक्टर बीज उपचार, 45×15 सेंटीमीटर, पूरी खाद (बारानी)
बुवाई के 10–15 दिन बादविरलीकरण; खाली जगह भरना
बुवाई के 20–25 दिन बादडोरा/कोल्पा चलाइए; खरपतवार निकालिए
नवंबरतना छेदक और चिकटा (एर्गट) पर नज़र; सिंचित में दूसरी सिंचाई
दिसंबरबाली निकलना; दूधिया अवस्था — पक्षियों से रखवाली; हुरड़े की योजना
जनवरी–फरवरीदाना सख़्त होते ही कटाई; कड़बा अलग सँभालिए; भाव की तुलना

निष्कर्ष

तीन बातें याद रखिए। पहली — 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच बोइए; रबी ज्वार में तारीख़ ही सबसे बड़ा इनपुट है, क्योंकि नमी लौटकर नहीं आती। दूसरी — किस्म मिट्टी की गहराई देखकर चुनिए, उथली मिट्टी में लंबी अवधि की किस्म दाना भरने से पहले ही सूख जाएगी। तीसरी — कड़बे और हुरड़े को हिसाब में जोड़िए; रबी ज्वार का पूरा मुनाफ़ा अकेले दाने में नहीं दिखता।

शालू ज्वार बारिश की फसल नहीं, नमी की फसल है — और नमी बचाने का काम बुवाई से पहले शुरू होता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1रबी ज्वार (शालू) की बुवाई कब करनी चाहिए?
महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ की सिफारिश के अनुसार रबी ज्वार की बुवाई 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच करनी चाहिए। यह फसल बारिश पर नहीं, मिट्टी में बची हुई नमी पर खड़ी होती है, इसलिए हर बीता हुआ हफ़्ता नमी को नीचे खिसका देता है और उपज की सीमा उसी दिन तय हो जाती है जिस दिन बोया गया। अक्टूबर के मध्य के बाद की बुवाई सबसे महँगी भूल है।
2रबी ज्वार में बीज दर कितनी रखें?
दाने के लिए 8–10 किलो प्रति हेक्टेयर यानी लगभग 3 किलो प्रति एकड़ बीज लगता है, जबकि चारे के लिए बोनी हो तो यह बढ़कर लगभग 40 किलो प्रति हेक्टेयर हो जाता है। कतार से कतार की दूरी 45 सेंटीमीटर और विरलीकरण के बाद पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर रखिए। बुवाई से पहले एज़ोटोबैक्टर 250 ग्राम प्रति 10 किलो बीज की दर से उपचार कीजिए।
3रबी ज्वार की कौन सी किस्म लगाएँ?
किस्म का चुनाव खेत की मिट्टी की गहराई से कीजिए — मध्यम गहराई (लगभग 60 सेंटीमीटर तक) वाली मिट्टी के लिए फुले सुचित्रा, फुले माउली, फुले चित्रा, परभणी मोती और मालदांडी 35-1, तथा भारी या गहरी मिट्टी (60 सेंटीमीटर से ज़्यादा) के लिए फुले वसुधा, फुले यशोदा और CSV-22 प्रचलित सिफारिशें हैं। उथली मिट्टी में लंबी अवधि की किस्म लगाने पर पौधा दाना भरने से पहले ही नमी खो देता है।
4फुले वसुधा किस्म की क्या ख़ासियत है?
फुले वसुधा लगभग 118–122 दिन में पकती है और पानी की कमी, तना छेदक तथा एर्गट (चिकटा) रोग — तीनों के प्रति सहनशील मानी जाती है। यह गहरी काली मिट्टी वाले खेतों के लिए सिफारिश की जाती है, जहाँ मिट्टी लंबी अवधि तक नमी पकड़कर रख सकती है। उथली मिट्टी में यह किस्म अपनी पूरी क्षमता नहीं दिखा पाती।
5रबी ज्वार में खाद कितनी डालें?
दशा के हिसाब से अलग — बारानी उथली से मध्यम मिट्टी में 40:20:00, बारानी गहरी मिट्टी में 60:30:00 और सिंचित दशा में 80:40:40 किलो NPK प्रति हेक्टेयर। बारानी दशा में पूरी मात्रा बुवाई के समय ही देनी चाहिए, क्योंकि बाद में डाली गई खाद को घोलने के लिए पानी ही नहीं होता और वह बर्बाद जाती है। सिंचित दशा में आधी नाइट्रोजन बुवाई पर और आधी पहली सिंचाई पर दीजिए।
6रबी ज्वार में कितनी सिंचाई चाहिए?
सिंचाई उपलब्ध हो तो तीन पानी दीजिए — पहला अंकुरण के समय, दूसरा बाली निकलने पर और तीसरा दाना भरते समय; ज़रूरत पड़ने पर यह पाँच तक जा सकता है। इनमें बाली निकलने वाला पानी सबसे ज़रूरी है। बारानी खेत में सिंचाई का विकल्प नहीं होता, इसलिए वहाँ पूरा ध्यान नमी बचाने पर रहता है — बुवाई के 20–25 दिन बाद डोरा चलाना और खरपतवार जल्दी निकालना।
7कड़बा और हुरड़ा से कितनी कमाई हो सकती है?
रबी ज्वार से तीन अलग कमाइयाँ निकलती हैं — दाना, कड़बा (सूखा चारा) और हुरड़ा। कड़बा बहुत अच्छा पशु-चारा है और महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में इसकी गाड़ी अलग बिकती है, कई बार दाने के बराबर या उससे ज़्यादा की कमाई देकर। हुरड़ा दिसंबर-जनवरी में दूधिया-मुलायम दाने को भूनकर बेचने का बाज़ार है और शहर के पास वाले खेतों के लिए सबसे ऊँची कीमत देता है — पर हुरड़े के लिए काटी गई बाली से दाना नहीं मिलेगा, इसलिए खेत का एक हिस्सा ही इसके लिए रखिए।
8खरीफ की ज्वार का बीज रबी में बो सकते हैं?
नहीं — खरीफ और रबी की ज्वार अलग किस्मों की फसल है, और खरीफ का बीज रबी में बोने पर दाना हल्का रहता है तथा रंग फीका पड़ जाता है। रबी ज्वार का दाना अपनी मोती जैसी सफ़ेदी और भाकरी की गुणवत्ता के लिए जाना जाता है, और मंडी में भाव उसी सफ़ेदी से तय होता है। इसलिए रबी के लिए मालदांडी 35-1, फुले वसुधा जैसी रबी की सिफारिश की गई किस्में ही लगाइए।
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