🚜 24 मशीनें · प्रति घंटा व प्रति एकड़ किराया · सौदा करने से पहले सही रेट जानिए
खेती की जो मशीन आप साल में कुछ ही दिन चलाते हैं, उसे खरीदने के बजाय किराये पर लेना लगभग हमेशा सस्ता पड़ता है। नीचे हर मशीन का आम किराया, उसे लेते समय क्या जाँचना है और उसे कहाँ से बुक करना है — तीनों दिए हैं।
खेत तैयार करने की मशीनें — ट्रैक्टर से लेकर लेज़र लेवलर तक। इनका किराया ज़्यादातर प्रति घंटा या प्रति एकड़ लिया जाता है।
बीज बोने और पौध रोपने की मशीनें। इनका किराया लगभग हमेशा प्रति एकड़ होता है, और सीज़न के 15–20 दिन में ही पूरी माँग निकलती है।
पानी चलाने के पंप और छिड़काव सेट। पंप का किराया घंटे के हिसाब से चलता है और डीज़ल आमतौर पर किसान का अपना लगता है।
दवा और खाद के छिड़काव की मशीनें, हाथ के स्प्रेयर से लेकर ड्रोन तक। किराया प्रति एकड़ चलता है, दवा किसान की अपनी।
फसल काटने, दाना निकालने और भूसा-चारा बनाने की मशीनें। सीज़न में इनकी बुकिंग सबसे पहले भरती है।
माल ढोने और खेत-मेड़ का काम करने वाली मशीनें। किराया ट्रिप, किलोमीटर या घंटे — तीनों तरह से चलता है।
सरकार ने हर ब्लॉक में यंत्रों के किराया केंद्र बनाए हैं, जहाँ मशीनें बाज़ार से सस्ते किराये पर मिलती हैं। सरकारी FARMS ऐप पर अपने आसपास का CHC ढूँढकर सीधे बुकिंग की जा सकती है।
ज़्यादातर सौदे आज भी गाँव में ही होते हैं — पड़ोसी किसान, सहकारी समिति या FPO के पास। रेट पूछने से पहले ऊपर दी रेंज देख लीजिए, ताकि आपको पता हो कि सही दाम क्या है। सीज़न के पीक हफ़्ते से 8–10 दिन पहले बात कर लेना सबसे सस्ता पड़ता है।
कौन-सी मशीन आपके ब्लॉक में कहाँ उपलब्ध है और उस पर कितनी सब्सिडी चल रही है — इसकी सही जानकारी यहीं मिलती है। यंत्र खरीदने पर मिलने वाली सब्सिडी का हिसाब भी एक बार ज़रूर देख लीजिए।
जिस मशीन का साल में 25–30 दिन से कम इस्तेमाल हो, उसे किराये पर लेना ही सस्ता है — ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर, लेज़र लेवलर और बेलर इसी श्रेणी में आते हैं। जो मशीन लगभग रोज़ चलती है, जैसे चारा काटने की मशीन, उसे खरीदना बेहतर है क्योंकि 4–6 महीने का किराया अक्सर नई मशीन के दाम के बराबर बैठ जाता है।
जुताई, बुवाई और कटाई जैसे कामों में प्रति एकड़ सौदा किसान के हक़ में रहता है, क्योंकि तब मशीन धीरे चलाने या बार-बार रुकने का घाटा आपका नहीं होता। पंप और JCB जैसे कामों में, जहाँ काम की मात्रा पहले से तय नहीं होती, घंटे का हिसाब ही चलता है — वहाँ पहले अनुमान लिखवा लीजिए।
नहीं। कृषि मित्र सिर्फ़ बताता है कि किस मशीन का किराया आमतौर पर कितना होता है और उसे लेने से पहले क्या जाँचना चाहिए। बुकिंग सीधे मशीन मालिक, गाँव के कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) या सरकारी FARMS ऐप से होती है।
CHC यंत्रों का किराया केंद्र है, जहाँ से किसान घंटे या एकड़ के हिसाब से मशीन किराए पर लेते हैं। इसे किसान, स्वयं सहायता समूह, FPO, सहकारी समिति या ग्राम पंचायत चला सकते हैं और परियोजना लागत पर सरकारी सहायता मिलती है। यहाँ किराया आमतौर पर बाज़ार से कम रहता है। सरकार का FARMS ऐप आसपास के CHC से सीधी बुकिंग की सुविधा देता है।
नहीं, ये अनुमानित रेंज हैं। असली किराया इलाके, सीज़न, डीज़ल के दाम और मशीन की हालत से बदलता है — पीक हफ़्ते में यह 30–40% तक चढ़ जाता है। इस रेंज का मक़सद यह है कि रेट पूछते समय आपको पता हो कि माँगा जा रहा दाम सही है या ज़्यादा।